उज्जैन. जिस समय भारत अलग-अलग जनपदों में बंटा था, आचार्य चाणक्य ने इसे एक सूत्र में पिरोकर अखंड भारत का निर्माण किया। आचार्य चाणक्य ने सुखी जीवन के लिए एक नीति शास्त्र की रचना की, जिसे चाणक्य नीति कहते हैं। इसमें लाइफ मैनेजमेंट के अनेक सूत्र बताए गए हैं। ऐसा ही एक सूत्र ये भी है…

त्यजेद्धर्मं दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
त्यजेत्क्रोधमुखं भार्यां नि:स्नेहान् बान्धवांस्त्यजेत्।।

जानिए क्या है इस श्लोक का अर्थ…
 

1. जिस धर्म में दया का उपदेश न हो, उस धर्म को छोड़ देना चाहिए। क्योंकि बिना दया के कोई भी धर्म मनुष्य को सही रास्ता नहीं दिखा सकता।
2. गुरु ही वो व्यक्ति होता है जो एक साधारण मनुष्य को जीवन के मूल्यों के बारे में बताता है और जीवन जीने की सही मार्ग सुझाता है। अगर गुरु ही ज्ञानहीन हो तो उसका त्याग कर देना चाहिए।
3. जिस घर में पति-पत्नी प्रेम पूर्वक रहते हैं, वह स्वर्ग के समान होता है। चाणक्य नीति के अनुसार अगर पत्नी क्रोधी स्वभाव की है तो उसके साथ जीवन-यापन मुश्किल हो जाता है, इसलिए ऐसी पत्नी को छोड़ देना चाहिए।
4. कठिन परिस्थिति में भाई-बहन ही सच्चा सहारा होते हैं। लेकिन अगर भाई-बहन में आपके प्रति कोई स्नेह का भाव न हो तो उनका त्याग करना ही बेहतर है।

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