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Ambubachi Mela 2022: कामाख्या में शुरू हुआ अंबुबाची मेला, 3 दिन बाद खुलेंगे मंदिर के कपाट, क्या है ये परंपरा?

हमारे देश में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां समय-समय पर अनोखी परंपराओं का पालन किया जाता है। असम (Assam) के गुवाहाटी (Guwahati) शहर में स्थित कामाख्या देवी मंदिर (Kamakhya Temple) भी इनमें से एक है। ये मंदिर शक्तिपीठों में शामिल है।
 

Kamakhya Temple Assam Guwahati Ambubachi Fair 51 Shaktipeeth MMA
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Ujjain, First Published Jun 23, 2022, 9:19 AM IST

उज्जैन. मान्यता के अनुसार, कामाख्या देवी मंदिर ही वो स्थान है, जहां देवी सती का योनी भाग गिरा था। ये मंदिर हजारों सालों से तांत्रिकों की साधना स्थली रहा है। देश के कोने-कोने से रोज यहां हजारों भक्त आते हैं। यहां आषाढ़ मास में लगने वाला अंबुबाची मेला भी काफी प्रसिद्ध है। इस बार अंबुबाची (Ambubachi Mela 2022) मेले की शुरूआत 22 जून से हो चुकी है जो 26 जून तक चलेगा। 22 जून को मंदिर के कपाट बंद होने के बाद 26 जून को सुबह मां को स्नान आदि कराने के बाद मंदिर के कपाट खोले जाएंगे। आगे जानिए क्या है ये परंपरा…

क्या है अंबुबाची मेले से जुड़ी मान्यता?
इस मेले से जुड़ी मान्यता काफी अजीब है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, साल में एक बार माता कामाख्या रजस्वला (मासिक धर्म) होती हैं। इस दौरान मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और किसी को भी मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता। 3 दिन बाद यानी रजस्वला समाप्ति के बाद मंदिर में विशेष पूजा की डाती है और भक्तों के लिए मंदिर के पट खोल दिए जाते हैं। इन 3 दिनों में यहां विशेष आयोजन किए जाते हैं, इसे ही अंबुबाची मेला कहा जाता है। इस दौरान यहां देश के कोने-कोने से भक्त दर्शन करने आते हैं।

गीले कपड़े का मिलता है प्रसाद
कामाख्या मंदिर से मिलने वाला प्रसाद भी बहुत अनोखा होता है। याहं भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गीला कपड़ा दिया जाता है, जिसे अंबुबाची वस्त्र कहा जाता है। देवी जब रजस्वला होती है तो इस दौरान दौरान प्रतिमा के आसपास सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है। तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोलते हैं तो यह कपड़ा माता के रज से लाल हो जाता है। इसी को प्रसाद के रूप में भक्तों को बांटा जाता है। भक्त इस कपड़े को बहुत ही पवित्र मानते हैं।

क्या है इस मंदिर से जुड़ी मान्यता?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपने पति महादेव का अपमान होते देखा तो यज्ञ कुंड में कूदकर अपना शरीर त्याग दिया। क्रोधित होकर शिवजी ने अपने गण वीरभद्र को प्रकट किया, जिसने दक्ष का यज्ञ नष्ट कर दिया। सती की मृत्यु से व्याकुल होकर शिवजी उनके शव को लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे। तब भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती से शरीर को कई हिस्सों में काट दिया। सती के शरीर के हिस्से जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ की स्थापना हुई। मान्यता के अनुसार, कामाख्या शक्तिपीठ पर देवी सती का योनी भाग गिरा था। ये मंदिर तंत्र-मंत्र के काफी प्रसिद्ध है।


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