श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को मंगला गौरी व्रत किया जाता है। यह व्रत विशेष तौर पर नवविवाहिताएं करती हैं। इस बार यह व्रत 7, 14, 21 और 28 जुलाई को है।

उज्जैन. धर्म शास्त्रों के अनुसार, विवाह के पांच वर्ष तक प्रत्येक श्रावण मास में महिलाओं को मंगला गौरी व्रत करना चाहिए।

Add Asianetnews Hindi as a Preferred SourcegooglePreferred

इस विधि से करें मंगला गौरी व्रत-
मंगलवार को सुबह जल्दी उठकर जरूरी काम करने क बाद यह संकल्प लें-
मैं पुत्र, पौत्र, सौभाग्य वृद्धि एवं श्री मंगला गौरी की कृपा प्राप्ति के लिए मंगला गौरी व्रत करने का संकल्प लेती हूं।
इसके बाद मां मंगला गौरी (पार्वतीजी) का चित्र या प्रतिमा एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। चित्र के सामने आटे से बना एक घी का दीपक जलाएं, जिसमें सोलह बत्तियां हों। इसके बाद यह मंत्र बोलें-
कुंकुमागुरुलिप्तांगा सर्वाभरणभूषिताम्।
नीलकण्ठप्रियां गौरीं वन्देहं मंगलाह्वयाम्।।
अब माता मंगला गौरी का षोडशोपचार पूजन करें। पूजन के बाद माता को सोलह माला, लड्डू, फल, पान, इलाइची, लौंग, सुपारी, सुहाग का सामान व मिठाई चढ़ाएं। उसके बाद मंगला गौरी की कथा सुनें।
कथा सुनने के बाद सोलह लड्डू अपनी सास को तथा अन्य सामग्री ब्राह्मण को दान कर दें। इसके बाद मंगला गौरी का सोलह बत्तियों वाले दीपक से आरती करें। श्रावण मास के बाद मंगला गौरी के चित्र को किसी नदी में प्रवाहित कर दें। पांच साल तक मंगला गौरी पूजन करने के बाद पांचवे वर्ष के श्रावण के अंतिम मंगलवार को इस व्रत का उद्यापन करना चाहिए।


ये है मंगला गौरी व्रत की कथा
किसी नगर में धर्मपाल नामक का एक सेठ रहता था। वह योग्य पत्नी एवं धन-वैभव की प्राप्ति के कारण सुखी था, किंतु उसकी कोई संतान नहीं थी। इसलिए वह बहुत दु:खी रहता था। भगवान की कृपा से उसे एक अल्पायु पुत्र प्राप्त हुआ। उसे सोलहवें वर्ष में सांप के डसने से मृत्यु होने का श्राप था।
सौभाग्य के उसका विवाह ऐसी कन्या से हो गया, जिसकी मां ने मंगला गौरी का व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से उत्पन्न कन्या को वैधव्य का दु:ख हो ही नहीं सकता था। इसके फलस्वरूप धर्मपाल का पुत्र को लंबी आयु प्राप्त हुई।