चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को शीतला सप्तमी कहते हैं। इस दिन शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए पूजा व व्रत किया जाता है।

उज्जैन. इस बार शीतला सप्तमी का व्रत 16 मार्च, सोमवार को है। कुछ स्थानों पर अष्टमी तिथि पर भी ये पर्व मनाया जाता है, जिसे शीतला अष्टमी (इस बार 17 मार्च, मंगलवार) कहते हैं। चूंकि इस व्रत में एक दिन पूर्व बनाया हुआ भोजन किया जाता है, अत: इसे बसौड़ा, बसियौरा व बसोरा भी कहते हैं।

Add Asianetnews Hindi as a Preferred SourcegooglePreferred

इस विधि से करें ये व्रत
- व्रती (व्रत करने वाली महिलाएं) को इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करना चाहिए। इसके बाद ये मंत्र बोलकर संकल्प लें-
मम गेहे शीतलारोगजनितोपद्रव प्रशमन पूर्वकायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धियेशीतला सप्तमी अष्टमी व्रतं करिष्ये
- संकल्प के बाद विधि-विधान से माता शीतला की पूजा करें। इसके बाद एक दिन पहले बनाए हुए (बासी) खाद्य पदार्थों, मेवे, मिठाई, पूआ, पूरी, दाल-भात आदि का भोग लगाएं।
- शीतला स्तोत्र का पाठ करें, शीतला माता की कथा सुनें व जगराता करें। इस दिन व्रती तथा उसके परिवार के किसी अन्य सदस्य को भी गर्म भोजन नहीं करना चाहिए।

शीतला सप्तमी की कथा इस प्रकार है-
किसी गांव में एक महिला रहती थी। वह शीतला माता की भक्त थी तथा शीतला माता का व्रत करती थी। उसके गांव में और कोई भी शीतला माता की पूजा नहीं करता था। एक दिन उस गांव में किसी कारण से आग लग गई। उस आग में गांव की सभी झोपडिय़ां जल गई, लेकिन उस औरत की झोपड़ी सही-सलामत रही।
सब लोगों ने उससे इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि मैं माता शीतला की पूजा करती हूं। इसलिए मेरा घर आग से सुरक्षित है। यह सुनकर गांव के अन्य लोग भी शीतला माता की पूजा करने लगे।

शीतला सप्तमी का महत्व
शीतला सप्तमी का व्रत करने से शीतला माता प्रसन्न होती हैं तथा जो यह व्रत करता है, उसके परिवार में दाहज्वर, पीतज्वर, दुर्गंधयुक्त फोड़े, नेत्र के समस्त रोग तथा ठंड के कारण होने वाले रोग नहीं होते। शीतला देवी के स्वरूप का शीतला स्तोत्र में इस प्रकार वर्णन किया गया है-
वन्देहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्।
मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालड्कृतमस्तकाम्।।

इस व्रत की विशेषता है कि इसमें शीतला देवी को भोग लगाने वाले सभी पदार्थ एक दिन पूर्व ही बना लिए जाते हैं और दूसरे दिन इनका भोग शीतला माता को लगाया जाता है। इसीलिए इस व्रत को बसोरा भी कहते हैं। मान्यता के अनुसार इस दिन घरों में चूल्हा भी नहीं जलाया जाता यानी सभी को एक दिन बासी भोजन ही करना पड़ता है।