कार्तिक मास (Kartik month 2021) के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कंद षष्ठी (Skanda Sashti 2021) का व्रत किया जाता है। इस बार ये व्रत 26 अक्टूबर, मंगलवार को है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह व्रत भगवान कार्तिकेय के लिए रखा जाता है। भगवान कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े पुत्र हैं। वे षष्ठी तिथि और मंगल ग्रह के स्वामी हैं। 

उज्जैन. भगवान कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के बड़े पुत्र हैं। वे षष्ठी तिथि और मंगल ग्रह के स्वामी हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, स्कंद षष्ठी (Skanda Sashti 2021) के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा से जीवन में हर तरह की बाधाएं दूर होती हैं और व्रत रखने वालों को सुख और वैभव की प्राप्ति होती है। साथ ही संतान के कष्टों को कम करने और उसके सुख की कामना से ये व्रत किया जाता है। इस दिन व्रत व पूजा करने से उत्तम संतान की प्राप्ति होती है।

Add Asianetnews Hindi as a Preferred SourcegooglePreferred

स्कंद षष्ठी का महत्व
स्कंद पुराण के नारद-श्री विष्णु संवाद के अनुसार संतान प्राप्ति और संतान की पीड़ाओं को दूर करने में यह व्रत बहुत सहायक माना गया है। पौराणिक शास्त्रों के अनुसार स्कंद षष्ठी के दिन स्वामी कार्तिकेय ने तारकासुर नामक राक्षस का वध किया था, इसलिए इस दिन भगवान कार्तिकेय के पूजन से जीवन में उच्च योग के लक्षणों की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान कार्तिकेय के पूजन से रोग, राग, दुःख और दरिद्रता का निवारण होता है। कार्तिकेय को स्कंद देव के अलावा मुरुगन, सुब्रमण्यम नामों से भी पूजा जाता हैं। इस दिन ब्राह्मण भोज के साथ स्नान के बाद कंबल, गरम कपड़े दान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

स्कंद षष्ठी व्रत विधि
सुबह जल्दी उठें और घर की साफ-सफाई करें। इसके बाद स्नान-ध्यान कर सर्वप्रथम व्रत का संकल्प लें। पूजा घर में मां गौरी और शिव जी के साथ भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा को स्थापित करें। पूजा जल, मौसमी फल, फूल, मेवा, कलावा, दीपक, अक्षत, हल्दी, चंदन, दूध, गाय का घी, इत्र आदि से करें। अंत में आरती करें। शाम को कीर्तन-भजन पूजा के बाद आरती करें। इसके पश्चात फलाहार करें।

मंत्र
देव सेनापते स्कंद कार्तिकेय भवोद्भव।
कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते॥

स्कंद षष्ठी व्रत कथा
भगवान कार्तिकेय के जन्म का वर्णन हमें पुराणों में ही मिलता है। जब देवलोक में असुरों ने आतंक मचाया हुआ था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था। लगातार राक्षसों के बढ़ते आतंक को देखते हुए देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से मदद मांगी थी। भगवान ब्रह्मा ने बताया कि भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा, परंतु उस काल च्रक्र में माता सती के वियोग में भगवान शिव समाधि में लीन थे। 
इंद्र और सभी देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने के लिए भगवान कामदेव की मदद ली और कामदेव ने भस्म होकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या को भंग किया। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया और दोनों देवदारु वन में एकांतवास के लिए चले गए। उस वक्त भगवान शिव और माता पार्वती एक गुफा में निवास कर रहे थे। 
उस वक्त एक कबूतर गुफा में चला गया और उसने भगवान शिव के वीर्य का पान कर लिया परंतु वह इसे सहन नहीं कर पाया और भागीरथी को सौंप दिया। गंगा की लहरों के कारण वीर्य 6 भागों में विभक्त हो गया और इससे 6 बालकों का जन्म हुआ। यह 6 बालक मिलकर 6 सिर वाले बालक बन गए। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म हुआ।