झरिया. झारखंड में विधानसभा चुनावों का एलान हो चुका है। सभी राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव को लेकर जनता के बीच अपना प्रचार शुरू कर दिया है। हर पार्टी के अपने मुद्दे हैं, जिनके दम पर वह चुनाव जीतने का सपना संजो रही है, पर किसी भी पार्टी ने झारखंड के झरिया की तरफ ध्यान नहीं दिया। दरअसल इस शहर पर कभी भी ध्यान नहीं दिया गया। पड़ोशी शहर धनबाद के विकास की खातिर हमेशा इस शहर की बलि चढ़ाई गई है।
झरिया में पहले अंडरग्राउंड माइनिंग होती थी। 1890 में अंग्रेजों ने इस शहर में कोयले की खोज की थी, तभी से झरिया में कोयले की खदानें बना दी गई थी। जमीन के नीचे ही इन खदानों के जरिए लाखों टन कोयला निकाला गया।
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झरिया की कोयला खदानें पिछले 100 साल से जल रही हैं। यहां 1916 से भूमिगत आग लगी हुई है। लोग यहां की जमीन पर रह रहे हैं, पर उन्हें अपने भविष्य के बारे में कुछ नहीं पता है। इन लोगों का जीवन धधकते अंगारों के बीच कट रहा है।
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झरिया में दुनिया का सबसे बेहतरीन कोयला है। पिछले सौ सालों में यहां का तीन करोड़ 17 लाख टन कोयला जलकर राख हो चुका है। इसके बावजूद एक अरब 86 करोड़ टन कोयला यहां की खदानों में बचा हुआ है।
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झरिया की कोयला खदानों में लगी आग को बुझाने का पहला प्रयास साल 2008 में किया गया था। जर्मन कंसलटेंसी फ़र्म डीएमटी ने आग के स्रोत का पता लगाकर उसे बुझाने की तकनीक से कोशिश की थी।
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अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा की फिल्म काला पत्थर झरिया की खदानों पर ही आधारित है। इस फिल्म में झरिया की खदानों में हुए एक हादसे को दिखाया गया था, जिसमें कई मजदूरों की मौत हो गई थी।
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