
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन इस समय आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही है। ताजा आंकड़ों ने संकेत दिए हैं कि चीन की आर्थिक रफ्तार पहले के मुकाबले धीमी हो गई है। दिलचस्प बात यह है कि जिस भारत से चीन का व्यापार लगातार बढ़ रहा है, उसी भारत ने GDP ग्रोथ के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर चीन की अर्थव्यवस्था पर ब्रेक क्यों लग रहा है और इसके पीछे कौन-कौन से कारण हैं।
हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल-जून तिमाही में चीन की GDP ग्रोथ घटकर 4.3 प्रतिशत रह गई। इससे पहले जनवरी-मार्च तिमाही में यह 5 प्रतिशत थी। यानी लगातार दूसरी तिमाही में चीन की आर्थिक रफ्तार कमजोर होती दिखाई दी। एक्सपर्ट्स के लिए भी यह गिरावट उम्मीद से अधिक रही। लंबे समय तक तेज विकास दर बनाए रखने वाले चीन के सामने अब घरेलू मांग, निवेश और रोजगार जैसी कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। ऐसे में सरकार पर अर्थव्यवस्था को गति देने का दबाव बढ़ गया है।
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हाल के आर्थिक आंकड़ों के मुताबिक भारत की GDP ग्रोथ 7.8 प्रतिशत दर्ज की गई, जो चीन की तुलना में काफी अधिक है। यह तब है, जब भारत अब भी चीन से बड़ी मात्रा में सामान आयात करता है और दोनों देशों के बीच व्यापारिक असंतुलन बना हुआ है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत में मजबूत घरेलू मांग, इंफ्रास्ट्रक्चर पर निवेश और सेवा क्षेत्र की तेजी आर्थिक वृद्धि को सहारा दे रही है। यही वजह है कि वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना हुआ है।
UBS China के चीफ इकोनॉमिस्ट यू सोंग के अनुसार, चीन की धीमी पड़ती अर्थव्यवस्था के पीछे तीन बड़े कारण हैं। पहला, रियल एस्टेट संकट। चीन का प्रॉपर्टी सेक्टर लंबे समय से दबाव में है, जिससे निवेश और खरीदारी दोनों प्रभावित हुए हैं।
दूसरा, उपभोक्ताओं का खर्च कम होना। बढ़ती लागत और वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण लोग महंगी खरीदारी से बच रहे हैं और बचत पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। तीसरा, रोजगार का दबाव। कई क्षेत्रों में नौकरियों की रफ्तार धीमी हुई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से उत्पादकता बढ़ी है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में पारंपरिक नौकरियों पर इसका असर भी देखा जा रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि AI अकेले चीन की आर्थिक सुस्ती की वजह नहीं है।
चीन की धीमी होती अर्थव्यवस्था और भारत की तेज ग्रोथ आने वाले समय में एशिया की आर्थिक तस्वीर को नया आकार दे सकती है। निवेशकों और वैश्विक बाजार की नजर अब दोनों देशों के अगले आर्थिक आंकड़ों पर टिकी हुई है।
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