
दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों, अमेरिका और चीन के रिश्ते हमेशा से प्रतिस्पर्धा, रणनीति और शक्ति संतुलन के इर्द-गिर्द घूमते रहे हैं। लेकिन जब वैश्विक संकट गहराता है, तब अक्सर वही देश एक-दूसरे की जरूरत बन जाते हैं। कुछ ऐसा ही दृश्य उस वक्त देखने को मिला, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प तीन दिवसीय चीन दौरे पर बीजिंग पहुंचे।
दिलचस्प बात यह रही कि ट्रंप ने इस यात्रा को लेकर खुलकर ज्यादा कुछ नहीं कहा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकार इसे अमेरिका की रणनीतिक मजबूरी के तौर पर देख रहे हैं। ईरान युद्ध, होर्मुज स्ट्रेट संकट और वैश्विक ऊर्जा सप्लाई पर बढ़ते दबाव के बीच ट्रंप का यह दौरा दुनिया की नजरों में बेहद अहम माना जा रहा है।
चीन में ट्रंप के दौरे के दौरान 1958 का एक ऐतिहासिक बयान फिर चर्चा में आ गया। उस समय चीन के नेता Mao Zedong ने अमेरिका की सैन्य नीतियों को लेकर कहा था कि अगर अमेरिका अपनी आक्रामक नीति जारी रखेगा, तो दुनिया एक दिन उसे अलग-थलग कर देगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि मौजूदा हालात में अमेरिका कुछ हद तक उसी तरह की कूटनीतिक चुनौती का सामना कर रहा है। ईरान के साथ बढ़ते तनाव में कई सहयोगी देश खुलकर अमेरिका के साथ खड़े नजर नहीं आए। ऐसे माहौल में ट्रंप का चीन पहुंचना वैश्विक राजनीति में बड़ा संकेत माना जा रहा है।
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बीजिंग दौरे के दौरान ट्रंप के साथ उनकी कैबिनेट के कई वरिष्ठ मंत्री और करीब 30 बड़े अमेरिकी उद्योगपति भी मौजूद रहे। तीन दिनों तक चली बैठकों में व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक सहयोग और पश्चिम एशिया के हालात पर चर्चा हुई। हालांकि, सबसे बड़ा सवाल यही बना रहा कि अमेरिका इस दौरे से हासिल क्या करना चाहता था।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार ट्रंप के इस दौरे की तुलना पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Richard Nixon की 1972 की ऐतिहासिक चीन यात्रा से कर रहे हैं। उस दौर में अमेरिका वियतनाम युद्ध में फंसा हुआ था और निक्सन को युद्ध से बाहर निकलने के लिए चीन के सहयोग की जरूरत थी। इसी वजह से अमेरिका ने पहली बार कम्युनिस्ट चीन के साथ रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया। उस समय चीन के प्रधानमंत्री Zhou Enlai ने निक्सन का स्वागत किया था। इतिहासकार मानते हैं कि वही दौरा अमेरिका-चीन संबंधों में बड़ा मोड़ साबित हुआ।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप की स्थिति भी कुछ हद तक निक्सन जैसी दिखाई दे रही थी। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मुद्दा वियतनाम नहीं, बल्कि ईरान और होर्मुज स्ट्रेट संकट है। Strait of Hormuz दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ईरान लगातार इस क्षेत्र में दबाव की रणनीति अपनाता रहा है, जिससे अमेरिका की चिंता बढ़ी हुई है। ट्रंप को यह एहसास था कि चीन को साथ लिए बिना ईरान के मुद्दे का स्थायी समाधान निकालना आसान नहीं होगा, क्योंकि चीन और ईरान के बीच रणनीतिक और आर्थिक संबंध काफी मजबूत हो चुके हैं।
ट्रंप की कोशिश थी कि चीन ईरान पर दबाव बनाए, लेकिन चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping ने बेहद संतुलित प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही बाधित नहीं होनी चाहिए और फारस की खाड़ी को युद्ध का मैदान बनने से बचाना जरूरी है। चीन ने अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका की सैन्य रणनीति पर भी सवाल खड़े किए। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन फिलहाल ईरान से दूरी बनाने के मूड में नहीं दिख रहा।
विश्लेषकों के मुताबिक, चीन और ईरान के मजबूत होते रिश्तों के पीछे काफी हद तक ट्रंप की पुरानी नीतियां भी जिम्मेदार मानी जाती हैं। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु समझौता खत्म कर दिया था और कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। उस दौरान अमेरिका ने चीन पर भी दबाव बनाया कि वह ईरान से तेल खरीदना बंद करे। लेकिन जब अमेरिका ने चीनी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए, तब चीन ने इसे अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों पर हमला माना। इसके बाद चीन और ईरान के बीच ऊर्जा और रणनीतिक साझेदारी और मजबूत होती चली गई।
ट्रंप के दौरे से ठीक पहले अमेरिका ने बीजिंग की पांच तेल कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए थे। आरोप था कि ये कंपनियां ईरान से तेल खरीद रही हैं। इसके जवाब में चीन ने साफ कहा कि उसे अमेरिकी प्रतिबंधों से कोई फर्क नहीं पड़ता। चीन का यह रुख बताता है कि वह अब अमेरिका के दबाव में आने के बजाय खुलकर अपनी रणनीतिक नीति पर आगे बढ़ना चाहता है।
ट्रंप का यह दौरा सिर्फ एक औपचारिक कूटनीतिक यात्रा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। एक तरफ अमेरिका ईरान संकट में चीन की मदद चाहता है, वहीं दूसरी तरफ दोनों देशों के बीच व्यापार, तकनीक और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसे में आने वाले समय में अमेरिका और चीन के रिश्ते दुनिया की राजनीति और वैश्विक अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
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