क्या रेज़ा पहलवी की वापसी भारत-ईरान रिश्तों को नई दिशा देगी या नया संकट खड़ा होगा?

Published : Jan 17, 2026, 03:49 PM IST

Explained: रेज़ा पहलवी की ईरान में वापसी भारत के लिए नई संभावनाएं खोल सकती है, लेकिन अमेरिका और पाकिस्तान से नज़दीकी भारत के रणनीतिक हितों-खासकर चाबहार पोर्ट के लिए बड़ा खतरा भी बन सकती है। सवाल यही है: दोस्ती या धोखा? 

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Reza Pahlavi Iran Return Impact On India: ईरान में सत्ता परिवर्तन की आहट के बीच एक नाम बार-बार सामने आ रहा है-रेज़ा पहलवी। ईरान के निर्वासित क्राउन प्रिंस, जो खुद को एक “लोकतांत्रिक ईरान” का चेहरा बता रहे हैं। उन्होंने भारत को अपना स्वाभाविक मित्र बताया है। क्या रेज़ा पहलवी की ईरान में वापसी सच में भारत के लिए अच्छी खबर होगी? या इसके पीछे कोई ऐसा खतरा छिपा है, जो भारत के रणनीतिक हितों को नुकसान पहुंचा सकता है?

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क्या लोकतांत्रिक ईरान का वादा पूरी सच्चाई है?

रेज़ा पहलवी का दावा है कि अगर वे सत्ता में लौटते हैं, तो ईरान लोकतांत्रिक होगा और भारत के साथ मजबूत रिश्ते बनाएगा। उन्होंने भारत-ईरान के प्राचीन सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों की बात भी की है। उनका कहना है कि भारत तकनीक, ऊर्जा और विशेषज्ञता के क्षेत्र में अग्रणी है और ईरान भारत के साथ मिलकर काम करना चाहता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में वादों से ज्यादा मायने इतिहास और रणनीति के होते हैं।

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 इतिहास क्या चेतावनी देता है?

रेज़ा पहलवी के पिता शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के शासनकाल में ईरान भारत का नहीं, बल्कि पाकिस्तान का करीबी सहयोगी था। 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध में ईरान ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था। कश्मीर मुद्दे पर भी ईरान ने भारत के बजाय पाकिस्तान का पक्ष लिया।

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क्या कश्मीर पर फिर बदलेगा ईरान का रुख?

1979 के बाद इस्लामिक रिपब्लिक ईरान ने कश्मीर पर अपेक्षाकृत तटस्थ रुख रखा। लेकिन अगर पहलवी सत्ता में लौटते हैं और पुरानी नीतियां वापस आती हैं, तो ईरान फिर से पाकिस्तान समर्थक रुख अपना सकता है। यह भारत के लिए एक बड़ा कूटनीतिक झटका हो सकता है।

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चाबहार बंदरगाह पर क्यों मंडरा रहा है खतरा?

भारत के लिए चाबहार पोर्ट सिर्फ एक व्यापारिक परियोजना नहीं, बल्कि पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का रणनीतिक रास्ता है। अगर पहलवी शासन अमेरिका के बहुत करीब चला जाता है, तो अमेरिकी प्रतिबंध और दबाव चाबहार परियोजना को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि रेज़ा पहलवी की वापसी भारत के लिए रणनीतिक जोखिम बन सकती है।

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अमेरिका-ईरान-पाकिस्तान गठबंधन का डर

विशेषज्ञों का मानना है कि पहलवी की वापसी पश्चिमी समर्थित सत्ता परिवर्तन के जरिए हो सकती है। इससे अमेरिका-ईरान-पाकिस्तान के बीच नया समीकरण बन सकता है, जो भारत की क्षेत्रीय स्थिति को कमजोर कर सकता है।

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फिर भी भारत को क्या फायदा हो सकता है?

यह पूरी तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। रेज़ा पहलवी भारत की आईटी, स्टार्ट-अप, नवीकरणीय ऊर्जा और तकनीकी ताकत की खुलकर तारीफ करते हैं। अगर ईरान वास्तव में संतुलित विदेश नीति अपनाता है, तो दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी सहयोग बढ़ सकता है।

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रेज़ा पहलवी अवसर या चेतावनी?

रेज़ा पहलवी की ईरान में वापसी भारत के लिए एक साथ अवसर और खतरा दोनों हो सकती है। जहां एक तरफ तकनीकी और आर्थिक सहयोग की संभावना है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान समर्थक नीति, अमेरिका की दखलअंदाजी और चाबहार पर खतरा भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

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