17 वर्षीय दीवा उत्कर्षा को फोर्ब्स की 30 अंडर 30 एशिया 2025 सूची में किस कैटेगरी में शामिल किया गया है? दीवा ने 'प्रोजेक्ट सूर्या' की शुरुआत कब और किस प्रेरणा से की थी? प्रोजेक्ट सूर्या ने अब तक टाइप 1 डायबिटीज से पीड़ित कितने बच्चों की मदद की है?

बेंगलुरु की 17 साल की दीवा उत्कर्षा ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उनका नाम फोर्ब्स की '30 अंडर 30 एशिया 2025' लिस्ट में सोशल इम्पैक्ट कैटेगरी में शामिल हुआ है। खास बात यह है कि वह इस साल इस कैटेगरी में जगह बनाने वाली सबसे कम उम्र की हस्ती हैं। द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दीवा को यह पहचान उनके नॉन-प्रॉफिट संगठन 'प्रोजेक्ट सूर्या' के लिए मिली है। यह संगठन टाइप 1 डायबिटीज से जूझ रहे बच्चों और उनके परिवारों की मदद करता है।

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बेंगलुरु के बसवेश्वर नगर में नेशनल एकेडमी फॉर लर्निंग से 12वीं पास दीवा अब अमेरिका में इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने की योजना बना रही हैं। उन्होंने द हिंदू को बताया, “फोर्ब्स 30 अंडर 30 में मेरा नाम 'प्रोजेक्ट सूर्या' की वजह से आया है, जो मेरा नॉन-प्रॉफिट संगठन है। मैंने यह प्रोजेक्ट 2021 में शुरू किया था, जब मैं 13 साल की थी। इसकी शुरुआत तब हुई जब मेरे छोटे भाई सूर्या को टाइप 1 डायबिटीज का पता चला।”

उन्होंने आगे कहा, “अपने परिवार को इस बीमारी के आर्थिक और भावनात्मक बोझ से जूझते देख, मैंने भारत के उन लाखों गरीब परिवारों के बारे में सोचा, जिन्हें बिना किसी सही मदद के इसी सच्चाई का सामना करना पड़ता है।”

प्रोजेक्ट सूर्या शुरू करने से पहले, दीवा और उनके माता-पिता, उत्कर्षा लोकेश और पल्लवी उत्कर्षा ने टाइप 1 डायबिटीज पर काफी रिसर्च की। इस चुनौती के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा, “टाइप 1 डायबिटीज एक ऐसी बीमारी है जो जिंदगी भर रहती है और इसमें जिंदा रहने के लिए रोज इंसुलिन के इंजेक्शन लेने पड़ते हैं। भारत में, एक मिडिल क्लास परिवार की कमाई का लगभग 18% इस बीमारी के मैनेजमेंट में चला जाता है, और 80% परिवारों को कोई सरकारी सब्सिडी या हेल्थ इंश्योरेंस भी नहीं मिलता।”

रिपोर्ट के अनुसार, प्रोजेक्ट सूर्या अब तक 4.02 लाख से ज्यादा लोगों तक पहुंच चुका है और टाइप 1 डायबिटीज से पीड़ित 3,190 बच्चों की सीधे तौर पर मदद की है। संगठन ने ग्रांट, पार्टनरशिप और कम्युनिटी फंडरेज़िंग के जरिए 20 लाख रुपये से ज्यादा जुटाए हैं।

इस पहल के असर पर बात करते हुए दीवा ने कहा, “हमने 200 से ज्यादा आशा हेल्थ वर्कर्स को भी ट्रेनिंग दी है ताकि हजारों गांवों में डायबिटीज को लेकर जागरूकता फैलाई जा सके, जिससे हम 49,500 ग्रामीणों तक पहुंचे। इन चार सालों में फ्री हेल्थ कैंप के जरिए 1,020 से ज्यादा ग्लूकोज स्क्रीनिंग भी की गईं।”

संगठन ने जरूरतमंद परिवारों को 4,500 इंसुलिन की शीशियां, 2,500 ग्लूकोज मॉनिटरिंग स्ट्रिप्स और 1,000 इंसुलिन सिरिंज दान की हैं। उनके इस काम को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय, इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन और WHO के मंचों पर भी सराहा गया है। दीवा की इन उपलब्धियों के लिए उन्हें प्रतिष्ठित डायना अवार्ड, Chegg.org ग्लोबल स्टूडेंट प्राइज के लिए टॉप 10 फाइनलिस्ट में जगह और वर्ल्ड सस्टेनेबिलिटी अवार्ड 2024 भी मिल चुका है। इन सम्मानों ने एशिया के सबसे होनहार युवा चेंजमेकर्स में उनकी जगह पक्की कर दी है।