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Rare Earth in Budget 2026: रेयर अर्थ के लिए ओडिशा, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश ही क्यों चुने गए? इसके पीछे छुपा बड़ा कारण
Budget 2026 Rare Earth Corridor: बजट में सरकार ने रेयर अर्थ मटेरियल को लेकर बड़ा ऐलान किया है। ओडिशा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में रेयर अर्थ के लिए डेडिकेटेड मिनरल पार्क और स्पेशल फैसिलिटी बनाए जाएंगे। जानिए इन तीनों राज्यों को ही क्यों चुना गया?

रेयर अर्थ क्या है?
रेयर अर्थ कोई एक धातु नहीं, बल्कि 17 खास तरह के मटेरियल का समूह है। नाम भले ही रेयर हो, लेकिन ये आज की दुनिया के लिए बेहद जरूरी हैं। मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक व्हीकल, विंड टर्बाइन, मिसाइल, रडार, कंप्यूटर और सेमीकंडक्टर तक लगभग हर आधुनिक टेक्नोलॉजी में इनका इस्तेमाल होता है।
भारत में रेयर अर्थ कितना है?
साल 1950 में इंडियर रेयर अर्थ लिमिटेड (IREL) की स्थापना हो चुकी थी। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि आने वाले समय में यही मटेरियल पूरी दुनिया की टेक्नोलॉजी की रीढ़ बन जाएगा। लेकिन जहां चीन ने समय रहते रेयर अर्थ को रणनीतिक हथियार बना लिया, वहीं भारत धीरे-धीरे इस रेस में पीछे छूट गया। नतीजा यह हुआ कि आज भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है। भारत में रेयर अर्थ उत्पादन की कुल क्षमता करीब 3,000 टन है। IREL हर साल लगभग 500 टन NdPr ऑक्साइड बनाती है, जो परमानेंट मैग्नेट का जरूरी कच्चा माल है। लेकिन मांग के मुकाबले यह बेहद कम है।
चीन पर कितनी बड़ी निर्भरता है?
आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 2024-25 में भारत ने 43,610 टन रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट का आयात किया। इसमें से करीब 90 फीसदी सिर्फ चीन से आया। यही मैग्नेट EV मोटर, एयरोस्पेस और हाई-टेक मशीनों के लिए सबसे अहम होते हैं।
रेयर अर्थ कॉरिडोर के लिए ओडिशा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश ही क्यों?
इन तीनों राज्यों को चुनने के पीछे कोई एक वजह नहीं, बल्कि कई बड़े कारण हैं, जो सीधे भारत के भविष्य से जुड़े हैं। सबसे बड़ी वजह है यहां की तटीय रेत। ओडिशा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के समुद्री किनारों पर मोनाजाइट नाम का खनिज भारी मात्रा में पाया जाता है। मोनाजाइट ही रेयर अर्थ का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत माना जाता है। आंध्र प्रदेश की करीब 974 किलोमीटर लंबी तटरेखा है, जबकि ओडिशा और तमिलनाडु के तट भी मोनाजाइट-समृद्ध माने जाते हैं। यही वजह है कि इन इलाकों में खनन करना तकनीकी और आर्थिक दोनों लिहाज से आसान है। ये तीनों राज्य तटीय हैं, यानी यहां से प्रोसेसिंग के बाद मटेरियल को देश और विदेश भेजना आसान है। पास में बंदरगाह होने की वजह से लागत कम होती है और सप्लाई चेन मजबूत बनती है। यही कारण है कि सरकार यहां डेडिकेटेड मिनरल पार्क बनाने पर फोकस कर रही है।
चीन पर निर्भरता घटाने की रणनीति
रेयर अर्थ सिर्फ व्यापार का मुद्दा नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है। मिसाइल, फाइटर जेट, रडार और स्पेस टेक्नोलॉजी में इनका इस्तेमाल होता है। चीन इस सेक्टर में सबसे आगे है और दुनिया का बड़ा रिफाइनर भी। सरकार अब नहीं चाहती कि भारत EV, डिफेंस और टेक्नोलॉजी के लिए किसी एक देश पर निर्भर रहे। ओडिशा, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश इस निर्भरता को कम करने की दिशा में सबसे मजबूत विकल्प बनकर उभरे हैं।
EV और ग्रीन एनर्जी से सीधा कनेक्शन
इन राज्यों से मिलने वाले नियोडिमियम और प्रेजियोडिमियम जैसे मटेरियल EV मोटर और विंड टर्बाइन के लिए बेहद जरूरी हैं। अगर देश में ही इनका उत्पादन बढ़ता है, तो आने वाले समय में EV सस्ते हो सकते हैं और ग्रीन एनर्जी को बड़ा बूस्ट मिल सकता है। इंडियन रेयर अर्थ्स लिमिटेड (Indian Rare Earths Limited) पहले से ही इन क्षेत्रों में एक्टिव है। खासकर आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में IREL की सुविधाएं मौजूद हैं। अब सरकार इसी नेटवर्क को और मजबूत करना चाहती है, ताकि रेयर अर्थ सिर्फ निकाले ही न जाएं, बल्कि भारत में ही प्रोसेस और रिफाइन भी हों।
रेयर अर्थ को लेकर सरकार के ऐलान से क्या फायदा होगा?
इस फैसले का असर सिर्फ इंडस्ट्री तक सीमित नहीं रहेगा। इससे नए रोजगार बनेंगे, EV और इलेक्ट्रॉनिक्स सस्ते हो सकते हैं, भारत की टेक्नोलॉजी ताकत बढ़ेगी और चीन पर निर्भरता घटेगी। यानी यह फैसला आने वाले 10-20 साल की तस्वीर बदल सकता है।
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