NSO के आंकड़ों से पता चला है कि भारत के बड़े शहरों में महिला श्रम बल की भागीदारी 2017-18 में 19.8% से बढ़कर 2025 में 27.2% हो गई है। यह श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी में एक महत्वपूर्ण वृद्धि को दर्शाता है।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में महिला श्रम बल की भागीदारी 2017-18 के 19.8 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 27.2 प्रतिशत हो गई है। यह श्रम बाजार में महिलाओं की भागीदारी में एक महत्वपूर्ण वृद्धि को दर्शाता है।

10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में श्रम बाजार की गतिशीलता पर डेटा से पता चला है कि पिछले कुछ सालों में श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी लगातार मजबूत हुई है। NSO के आंकड़ों में महिला रोजगार में सुधार पर भी प्रकाश डाला गया है। दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में महिलाओं के लिए श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR) बढ़कर 25.5 प्रतिशत हो गया, जो यह बताता है कि पिछले वर्षों की तुलना में महिलाओं का एक बड़ा हिस्सा अब नियोजित है।
समग्र श्रम बल में भी हुआ सुधार
रिपोर्ट में कहा गया, 'जैसे-जैसे भारत विकसित भारत के दृष्टिकोण की ओर बढ़ रहा है, उसके शहर आर्थिक गतिविधि, नवाचार और रोजगार सृजन के महत्वपूर्ण केंद्रों के रूप में उभर रहे हैं। सूचित नीति-निर्माण, कुशल संसाधन आवंटन और साक्ष्य-आधारित शासन के लिए शहरों की आर्थिक संरचना और गतिशीलता की गहरी समझ का महत्व बढ़ता जा रहा है।'
इन शहरों में समग्र श्रम बल भागीदारी में भी सुधार हुआ है। सामान्य स्थिति में श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 2025 में बढ़कर 52.4 प्रतिशत हो गई, जो 2021-22 में 50.4 प्रतिशत और 2017-18 में 47.7 प्रतिशत थी।
बेरोजगारी दर में गिरावट, पुरुषों और महिलाओं के कारण अलग
रिपोर्ट से पता चला है कि बेरोजगारी का स्तर मोटे तौर पर शहरी भारत के अनुरूप ही रहा। सामान्य स्थिति दृष्टिकोण के तहत दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में बेरोजगारी दर 4.9 प्रतिशत और वर्तमान साप्ताहिक स्थिति (CWS) दृष्टिकोण के तहत 6.8 प्रतिशत रही, जबकि शहरी भारत के लिए यह क्रमशः 4.8 प्रतिशत और 6.8 प्रतिशत थी। पुरुषों में, पिछले कुछ वर्षों में बेरोजगारी में लगातार गिरावट आई है, पुरुषों की बेरोजगारी दर 2017-18 के 7.5 प्रतिशत से घटकर 2025 में 4.5 प्रतिशत हो गई है।
रिपोर्ट में लोगों के श्रम बल से बाहर रहने के कारणों की भी जांच की गई। पुरुषों में, 53.5 प्रतिशत ने श्रम बाजार में भाग न लेने का मुख्य कारण अपनी पढ़ाई जारी रखना बताया। वहीं, महिलाओं में 68.7 प्रतिशत ने बच्चों की देखभाल और गृहस्थी से जुड़ी व्यक्तिगत प्रतिबद्धताओं को प्राथमिक कारण बताया।
कमाई ज्यादा और NEET युवा भी कम
NSO के आंकड़ों से यह भी पता चला है कि दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में कमाई रोजगार की सभी श्रेणियों में शहरी भारत के औसत से अधिक रही। स्व-नियोजित श्रमिकों की औसत मासिक कमाई 30,858 रुपये रही, जबकि शहरी भारत में यह 23,013 रुपये थी। नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों ने प्रति माह औसतन 28,808 रुपये कमाए, जबकि शहरी भारत में यह 26,258 रुपये था। वहीं, दिहाड़ी मजदूरों ने राष्ट्रीय स्तर पर 550 रुपये के मुकाबले प्रतिदिन 624 रुपये कमाए।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि 15-29 वर्ष की आयु के युवाओं का हिस्सा, जो रोजगार, शिक्षा या प्रशिक्षण (NEET) में नहीं थे, दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में 22.2 प्रतिशत था, जबकि शहरी भारत के लिए यह 25.0 प्रतिशत था।
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