Money Saving Tips: ₹1 लाख महीना कमाने के बाद भी सेविंग जीरो है? जानिए वो 4 छुपे हुए लाइफस्टाइल ट्रैप, जिनकी वजह से महीने के आखिर में अकाउंट खाली रह जाता है।
Luxury Lifestyle Traps: महीने की 1 तारीख को सैलरी आती है। अकाउंट में ₹1,00,000 दिखता है। मन खुश हो जाता है। फिर 28 तारीख आते-आते अकाउंट में सिर्फ ₹5,000 या शायद उससे भी कम बचता है? आजकल मेट्रो सिटीज में रहने वाले युवाओं और कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स के बीच यही ट्रेंड देखा जा रहा है। सैलरी तो 6 फिगर में है, लेकिन सेविंग्स के नाम पर जीरो ही है। एक हालिया स्टडी बताती है कि भारत में सैलरी पाने वाले लोग अपनी महीने की कमाई का 33% से ज्यादा सिर्फ EMI चुकाने में खर्च कर देते हैं। यानी हर तीसरा रुपया, कमाने से पहले ही किसी और का हो जाता है। अगर आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है और आप भी इसी कशमकश में हैं कि आखिर सारा पैसा जा कहां रहा है, तो हो सकता है आप अनजाने में ही किसी 'लग्जरी लाइफस्टाइल ट्रैप' में फंस चुके हों। आइए जानते हैं ये चारों 'लग्जरी ट्रैप' क्या हैं...

ट्रैप नंबर 1: 'सैलरी बढ़ी है तो लाइफस्टाइल भी बढ़े' वाली सोच
इसे फाइनेंस की भाषा में लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन कहते हैं। मतलब जैसे ही सैलरी बढ़ती है, खर्च भी उसी रफ्तार से बढ़ जाता है। मान लीजिए आपकी सैलरी ₹60,000 से बढ़कर ₹1,00,000 हो गई। अब आपने सोचा, पुरानी बाइक की जगह कार ले लेते हैं, 1BHK की जगह 2BHK में शिफ्ट हो जाते हैं और हफ्ते में दो बार बाहर खाना तो बनता ही है। हर फैसला अकेले में सही लगता है। लेकिन जब सब एक साथ जुड़ते हैं, तो बढ़ी हुई सैलरी का पूरा फायदा गायब हो जाता है। नतीजा यह होता है कि सैलरी डबल हो गई, लेकिन सेविंग पहले जैसी ही रह गई, या उससे भी कम।
इससे कैसे बचें?
जब भी सैलरी बढ़े, तो पूरा पैसा खर्च में मत डालिए। एक आसान नियम अपनाइए, बढ़े हुए पैसे का सिर्फ आधा हिस्सा लाइफस्टाइल पर खर्च करें, बाकी आधा सीधा सेविंग या इन्वेस्टमेंट में डाल दें। इस तरह लाइफ भी बेहतर होगी और पैसा भी बढ़ेगा।
ट्रैप नंबर 2: हर चीज EMI पर लेने की आदत
EMI ने लाइफ आसान बना दी है, यह बात सही है। लेकिन इसी आसानी ने एक खतरनाक आदत भी बना दी है। एक चौंकाने वाला आंकड़ा है कि भारत में बिकने वाले 70% आईफोन EMI पर खरीदे जाते हैं और करीब 27% छुट्टियां भी लोन लेकर मनाई जाती हैं। यानी फोन हो या फॉरेन ट्रिप, हर चीज के लिए EMI तैयार है। समस्या यह है कि EMI से चीज खरीदते समय दर्द महसूस नहीं होता, क्योंकि एक साथ बड़ा पैसा नहीं जाता, लेकिन हर महीने 5-6 अलग-अलग EMI जुड़कर सैलरी का बड़ा हिस्सा खा जाती हैं। फोन की EMI, बाइक-कार की EMI, फर्नीचर की EMI, और क्रेडिट कार्ड का बिल अलग से। औसतन एक मिड-रेंज कार की EMI ही करीब ₹9,200 महीना होती है। इसमें फोन, गैजेट्स और छुट्टियों की EMI जोड़ दें, तो आसानी से सैलरी का एक-तिहाई हिस्सा सिर्फ EMI में चला जाता है यानी इन्वेस्टमेंट के लिए कुछ नहीं बचता है।
इससे कैसे बचें?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के अनुसार, एक सिंपल टेस्ट करें। घर का किराया छोड़कर अपनी सभी EMI जोड़ लें। अगर यह आपकी टेक-होम सैलरी के 40% से ज्यादा है, तो समझ लीजिए कि अभी कोई नई EMI लेने का समय नहीं है। नई चीज खरीदने से पहले खुद से पूछें, 'क्या मैं इसे कैश में खरीद सकता हूं?' अगर जवाब ना है, तो शायद अभी जरूरत भी नहीं है।
ट्रैप नंबर 3: बड़ा घर, बड़ी गाड़ी से समाज को दिखाना
यह ट्रैप सबसे चुपके से असर डालता है, क्योंकि यह पैसे का नहीं, बल्कि सोच का मामला है। भारत में अभी भी यह माना जाता है कि बड़ी कार और बड़ा घर ही सफलता की निशानी है। इसलिए बहुत से लोग अपनी जरूरत से बड़ा घर लोन पर ले लेते हैं या सिर्फ इसलिए महंगी कार खरीद लेते हैं क्योंकि दोस्त या रिश्तेदार ने ली थी। लेकिन घर और कार दोनों ऐसी चीजें हैं जिनकी EMI लंबे समय तक चलती है, 15, 20 साल तक। अगर यह EMI आपकी सैलरी के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लेती है, तो आपके पास इन्वेस्ट करने के लिए, इमरजेंसी के लिए या बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसा नहीं बचता। ध्यान देने वाली बात है कि कार जैसी चीज की वैल्यू समय के साथ कम होती जाती है, लेकिन उस पर चल रही EMI पूरी की पूरी चलती रहती है। यानी आप घटती हुई चीज के लिए पूरी कीमत चुका रहे होते हैं।
इससे कैसे बचें?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स कहते हैं कि घर खरीदने से पहले एक आसान हिसाब लगा लें। घर की EMI और बाकी सारी EMI मिलाकर आपकी टेक-होम सैलरी के 40% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। कार लेते वक्त भी यही सोचें कि क्या सच में कार चाहिए या कैब और मेट्रो से काम चल सकता है? कई शहरों में कैब सब्सक्रिप्शन कार की EMI से कहीं सस्ता पड़ता है।
ट्रैप नंबर 4: इमरजेंसी फंड और इंश्योरेंस को इग्नोर करना
यह ट्रैप सबसे खतरनाक है, क्योंकि इसका असर तब दिखता है जब सबसे ज्यादा मुसीबत में हों। ज्यादातर सैलरी पाने वाले लोग सोचते हैं कि 'अभी तो कमा रहा हूं, इमरजेंसी फंड बाद में बना लेंगे।' लेकिन अगर अचानक नौकरी चली जाए, मेडिकल इमरजेंसी आ जाए या कोई बड़ा खर्च सामने आ जाए, तो EMI में फंसी हुई सैलरी वाले के पास कोई सहारा नहीं बचता है। बिना इमरजेंसी फंड के एक भी महीने की सैलरी रुकने पर पूरा बजट बिगड़ जाता है और बिना सही हेल्थ इंश्योरेंस एक हॉस्पिटल बिल सालों की सेविंग खत्म कर सकता है।
इससे कैसे बचें?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स के अनुसार, सबसे पहले 3 से 6 महीने के खर्च के बराबर पैसा अलग रखें। इसे किसी आसानी से निकाले जाने वाली जगह पर रखें, शेयर मार्केट में नहीं। इसके बाद अपने और फैमिली के लिए सही हेल्थ इंश्योरेंस लें, सिर्फ कंपनी वाले इंश्योरेंस पर निर्भर न रहें, क्योंकि नौकरी छूटने पर वह भी साथ छूट जाता है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी सिर्फ शिक्षा और जागरूकता के मकसद से है, इसे फाइनेंशियल या इन्वेस्टमेंट सलाह न समझें। हर व्यक्ति की सैलरी, खर्च और जिम्मेदारियां अलग होती हैं, इसलिए कोई भी बड़ा फाइनेंशियल फैसला लेने से पहले अपनी स्थिति के हिसाब से किसी सर्टिफाइड फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह जरूर लें। इस आर्टिकल में दिए गए आंकड़े पब्लिक रिपोर्ट्स और स्टडीज पर आधारित हैं, जो समय के साथ बदल सकते हैं।


