RBI के नए नियम से रुपये में ज़बरदस्त वापसी हुई। बैंकों के लिए 'नेट ओपन पोज़िशन' की सीमा $100 मिलियन तय होने से उन्हें अतिरिक्त डॉलर बेचने पड़े। इससे रुपया 94.84 से मज़बूत होकर 93.85 पर पहुंच गया।
रिकॉर्ड तोड़ गिरावट के बाद रुपये ने ज़बरदस्त वापसी की है। शुक्रवार को अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंचने के बाद, रिज़र्व बैंक (RBI) के एक अचानक और कड़े फैसले से रुपये में आज कारोबार की शुरुआत में ही बड़ी तेज़ी देखने को मिली। आज बाज़ार खुलते ही डॉलर के मुकाबले रुपया लगभग एक प्रतिशत चढ़कर 93.85 पर पहुंच गया। पिछले शुक्रवार को रुपया 94.84 के अपने अब तक के सबसे खराब स्तर पर बंद हुआ था। वहां से यह लगभग एक रुपये की सीधी बढ़त है।
RBI का 'मास्टरस्ट्रोक'
विदेशी मुद्रा बाज़ार में उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए, रिज़र्व बैंक ने बैंकों के लिए 'नेट ओपन पोज़िशन' की सीमा 100 मिलियन डॉलर तय कर दी है। यह नियम हर कारोबारी दिन के अंत में लागू होगा। शुक्रवार शाम को इससे जुड़ा आदेश जारी किया गया। RBI ने साफ किया है कि सभी बैंकों को 10 अप्रैल तक इस निर्देश का सख्ती से पालन करना होगा। इस नए नियम से बैंक विदेशी मुद्रा बाज़ार में बड़ी मात्रा में डॉलर जमा नहीं कर पाएंगे और न ही सट्टेबाज़ी कर पाएंगे। इसके चलते बैंकों को अपने पास रखे अतिरिक्त डॉलर बाज़ार में बेचने पड़े। बाज़ार में डॉलर की सप्लाई बढ़ते ही रुपये की कीमत अचानक बढ़ गई। आर्थिक जानकारों का मानना है कि यह कदम आने वाले दिनों में भी रुपये को गिरने से रोकने में मदद करेगा।
क्या है 'ओपन पोज़िशन'?
मान लीजिए कि एक बैंक किसी खास करेंसी (जैसे डॉलर) को खरीदता या बेचता है। लेकिन उस सौदे को पूरा करने के लिए कोई उलटा सौदा (यानी खरीदने के बाद बेचना या बेचने के बाद वापस खरीदना) नहीं करता है, तो इसे 'ओपन पोज़िशन' कहा जाता है।
लॉन्ग पोज़िशन: जब बेची गई करेंसी से ज़्यादा खरीदी गई हो।
शॉर्ट पोज़िशन: जब खरीदी गई करेंसी से ज़्यादा बेची गई हो।
'नेट' ओपन पोज़िशन
बैंक एक दिन में सैकड़ों लेन-देन करते हैं। दिन के आखिर में, उनके द्वारा खरीदी गई कुल करेंसी और बेची गई कुल करेंसी के बीच के बैलेंस को 'नेट ओपन पोज़िशन' कहते हैं।
'100 मिलियन डॉलर' की लिमिट का क्या मतलब है?
रिज़र्व बैंक की इस लिमिट का मतलब है कि कोई भी बैंक दिन खत्म होने पर 100 मिलियन डॉलर से ज़्यादा के 'ओपन' सौदे नहीं रख सकता। यानी, बैंक के पास मौजूद अतिरिक्त डॉलर या बिकने के लिए बाकी डॉलर की कुल कीमत इस लिमिट से ज़्यादा नहीं हो सकती। अगर किसी बैंक के पास इस लिमिट से ज़्यादा रकम है, तो उसे बाज़ार में उसे बेचकर या खरीदकर बैलेंस करना होगा।


