Repo Rate vs Reverse Repo Rate: रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट क्या होता है? जानिए सिर्फ 0.25% की बढ़ोतरी से ही आपके लोन की EMI और महंगाई कैसे बढ़ जाती है।

Repo Rate Explainer: भारतीय रिजर्व बैंक की तीन दिवसीय मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक पूरी हो चुकी है। आज, 7 अक्टूबर को सुबह 10 बजे RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा नीतिगत दरों को लेकर देश के सामने बड़ा फैसला सुनाएंगे। इसके बाद ये साफ होगा कि आपकी होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन की EMI का बोझ बढ़ेगा या राहत बरकरार रहेगी। आरबीआई ने पिछली चार बैठकों से रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखा हुआ है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों (करीब $98.59 प्रति बैरल) और महंगाई के बढ़ते दबाव के बीच इस बार चार साल में पहली बार दरें बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर ये रेपो रेट है क्या, और जब आरबीआई इसमें महज 0.25% की बढ़ोतरी करता है, तो इसका आपकी जेब पर असर कैसे पड़ता है...

रेपो रेट क्या होता है?

जैसे आपको पैसे की जरूरत पड़ने पर आप बैंक से पर्सनल या होम लोन लेते हैं और उस पर ब्याज चुकाते हैं, ठीक वैसे ही जब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI), HDFC या PNB जैसे बैंकों को पैसों की जरूरत होती है, तो वे देश के केंद्रीय बैंक यानी रिजर्व बैंक (RBI) से कर्ज लेते हैं। जिस ब्याज दर पर आरबीआई बाकी बैंकों को कर्ज देता है, उसे ही रेपो रेट कहा जाता है।

रिवर्स रेपो रेट क्या होता है?

रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) रेपो रेट का बिल्कुल उल्टा है। जब बैंकों के पास ज्यादा कैश जमा हो जाता है और वे उसे सुरक्षित रखने के लिए आरबीआई के पास जमा करते हैं, तो उस जमा रकम पर आरबीआई उन्हें जो ब्याज देता है, उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं। जब आरबीआई चाहता है कि बाजार से पैसे का बहाव कम हो, तो वो रिवर्स रेपो रेट बढ़ा देता है, जिससे बैंक आम जनता को लोन देने के बजाय अपना पैसा आरबीआई के पास जमा करके सुरक्षित मुनाफा कमाने लगते हैं।

रेपो रेट बढ़े तो आपकी EMI क्यों बढ़ सकती है?

मान लीजिए RBI रेपो रेट 0.25% बढ़ा देता है। इससे बैंकों के लिए RBI से पैसा लेना महंगा हो सकता है। बैंक भी अपने लोन की ब्याज दरों में बदलाव कर सकते हैं। सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ सकता है, जिनका लोन फ्लोटिंग रेट से जुड़ा है। इसमें होम लोन, पर्सनल लोन या दूसरे लोन शामिल हो सकते हैं, हालांकि हर लोन पर असर एक जैसा नहीं होता है। रेट बढ़ने पर बैंक आपके लोन की ब्याज दर बढ़ा सकता है। इसके बाद दो चीजों में बदलाव हो सकता है, आपकी EMI बढ़ सकती है या लोन चुकाने का समय बढ़ सकता है। कुछ मामलों में दोनों का असर देखने को मिल सकता है।

रेपो रेट में महज 0.25% की बढ़ोतरी से आपकी EMI क्यों महंगी हो जाती है?

अक्सर लोग सोचते हैं कि 0.25% का बदलाव तो बहुत छोटा है, फिर इससे इतना फर्क क्यों पड़ता है? इसका गणित बेहद सिंपल है। जब आरबीआई रेपो रेट बढ़ाता है, तो बैंकों को आरबीआई से मिलने वाला कर्ज महंगा हो जाता है। बैंक अपने पास से घाटा नहीं सहते हैं। वे अपनी बढ़ती लागत का बोझ अपने ग्राहकों यानी आप और हम पर डाल देते हैं। बैंक तुरंत अपने फ्लोटिंग रेट वाले होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन पर ब्याज दरें बढ़ा देते हैं। मान लीजिए आपने 20 साल के लिए ₹30 लाख का होम लोन 8.50% की ब्याज दर पर लिया हुआ है। आपकी मौजूदा मासिक ईएमआई करीब ₹26,035 बन रही है। अगर रेपो रेट में महज 0.25% की बढ़ोतरी होती है और बैंक इसे 8.75% कर देता है, तो आपकी ईएमआई बढ़कर लगभग ₹26,511 हो जाएगी। यानी हर महीने करीब ₹476 का सीधा नुकसान और 20 साल के पूरे टेन्योर में आपको ₹1.14 लाख से ज्यादा एक्स्ट्रा ब्याज भरना पड़ेगा।

रेपो रेट में 0.25% की बढ़ोतरी से चीजें महंगी क्यों हो जाती हैं?

रेपो रेट सिर्फ ईएमआई तक सीमित नहीं है, ये देशभर में महंगाई पर ब्रेक लगाने का 'रिमोट कंट्रोल' है। जब बाजार में हर चीज के दाम भाग रहे होते हैं, तो आरबीआई रेपो रेट बढ़ा देता है। लोन महंगे होने से लोग घर, गाड़ी, गैजेट्स और गैर-जरूरी खरीदारी टालने लगते हैं। जब मांग घटती है, तो कंपनियां और दुकानदार अपने आप सामान के दाम घटाने पर मजबूर हो जाते हैं। जब मंदी का माहौल होता है, तो आरबीआई रेपो रेट घटा देता है। लोन सस्ते होने से लोग खुलकर खरीदारी करते हैं, फैक्ट्रियों को सस्ता कर्ज मिलता है और बाजार में रौनक लौट आती है।

रेपो रेट घटे तो EMI सस्ती कैसे हो सकती है?

अब इसका उल्टा समझिए। अगर RBI रेपो रेट घटाता है तो बैंकों के लिए फंडिंग की लागत कम होने की गुंजाइश बनती है। इसका असर आगे चलकर कुछ लोन की ब्याज दरों में कमी के रूप में दिखाई दे सकता है। अगर आपका फ्लोटिंग रेट वाला लोन ऐसे बेंचमार्क से जुड़ा है जो RBI की पॉलिसी दरों में बदलाव को जल्दी दिखाता है, तो ब्याज दर घटने पर EMI कम हो सकती है या लोन की अवधि घट सकती है। यही वजह है कि RBI के रेट कट का इंतजार करने वाले लोग अक्सर होम लोन और दूसरे बड़े कर्ज की ब्याज दरों पर नजर रखते हैं। दूसरी तरफ, ब्याज दर कम होने का असर FD जैसी बचत पर भी पड़ सकता है। बैंक नए डिपॉजिट पर ब्याज दरों में बदलाव कर सकते हैं। इसलिए कम रेट का फायदा कर्ज लेने वालों को मिल सकता है, लेकिन सेविंग्स पर मिलने वाले रिटर्न की तस्वीर अलग हो सकती है।

RBI रेपो रेट क्यों बढ़ाता या घटाता है?

इसका सबसे बड़ा कारण महंगाई और आर्थिक ग्रोथ के बीच बैलेंस बनाना है। जब महंगाई ज्यादा बढ़ने का खतरा होता है तो RBI ब्याज दर बढ़ाकर बाजार में पैसे की रफ्तार कम करने की कोशिश कर सकता है। महंगा कर्ज लोगों और कंपनियों को कम उधार लेने के लिए मजबूर कर सकता है, जिससे मांग पर दबाव आता है और महंगाई को काबू करने में मदद मिल सकती है। वहीं, जब महंगाई कंट्रोल में हो और अर्थव्यवस्था को सपोर्ट की जरूरत हो तो RBI ब्याज दर कम कर सकता है। इससे कर्ज लेना आसान हो सकता है और खर्च तथा निवेश को बढ़ावा मिल सकता है।