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Kamal Ranadive जिन्हें देख महिलाओं में जागी वैज्ञानिक बनने की इच्छा, कैंसर को लेकर कई थे कई रिसर्च

कमल रणदिवे ने शुरुआती दौर में कैंसर पर कई रिसर्च किए। स्तन कैंसर की घटना और आनुवंशिकता के बीच संबंध का प्रस्ताव रखने वाली वह पहली शख्स थीं। 

Dr Kamal Ranadive: Google Doodle Celebrating Her Birthday
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New Delhi, First Published Nov 8, 2021, 8:05 AM IST
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करियर डेस्क. डॉ. कमल रणदिवे (Dr. Kamal Ranadive) के 104 वें जन्मदिन के मौके पर Google ने डूडल बनाकर उन्हें याद किया है। कमल का जन्म महाराष्ट्र के पुणे में 8 नवंबर 1917 को हुआ था। वो एक भारतीय बायोमेडिकल रिसर्चर थीं उन्होंने कैंसर और वायरस के बीच संबंधों के बारे में रिसर्च किया था। वह भारतीय महिला वैज्ञानिक संघ (IWSA) की संस्थापक सदस्य थीं।

कैंसर पर किया रिसर्च
कमल रणदिवे ने शुरुआती दौर में कैंसर पर कई रिसर्च किए। स्तन कैंसर की घटना और आनुवंशिकता के बीच संबंध का प्रस्ताव रखने वाली वह पहली शख्स थीं। इस बात की पुष्टि कई रिसर्चर्स ने की थी। कमल के पिता दिनकर पुणे के फर्गसन कॉलेज में एक जीवविज्ञान के प्रोफेसर थे। उनका फोकस बच्चों की पढ़ाई में थे वो चाहते थे कि उनकी बेटी को ऐसी शिक्षा मिले जो देश की दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा हो। 

पद्म भूषण से सम्मानित
कमल की प्रारंभिक शिक्षा पुणे के गर्ल्स स्कूल, हुज़ूरपागा में हुई।  उनके पिता चाहते थे कि दसवीं के बाद वे मेडिकल पढ़ें, उन्होंने फ़र्गुसन कॉलेज से बॉटनी और जूलॉजी में बीएससी की। 1960 के दशक में, उन्होंने मुंबई में भारतीय कैंसर अनुसंधान केंद्र में भारत की पहली ऊतक संस्कृति अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना की। उन्हें चिकित्सा के लिए 1982 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

उन्होंने बॉम्बे में प्रायोगिक जीव विज्ञान प्रयोगशाला और ऊतक संस्कृति प्रयोगशाला की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1966 से 1970 तक उन्होंने अभिनय क्षमता में भारतीय कैंसर अनुसंधान केंद्र के निदेशक का पद संभाला था। 1960 के दशक की शुरुआत में, उन्होंने जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान के क्षेत्र में अपने सहायकों (जिन्हें उन्होंने ICRC में शामिल किया था) के साथ, टिशू कल्चर मीडिया और संबंधित अभिकर्मकों का विकास किया। 

1949 में, उन्होंने भारतीय कैंसर अनुसंधान केंद्र (ICRC) में एक शोधकर्ता के रूप में काम करते हुए, कोशिका विज्ञान, कोशिकाओं के अध्ययन में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। बाल्टीमोर, मैरीलैंड, यूएसए में जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय में फेलोशिप के बाद, वह मुंबई और आईसीआरसी लौट आईं। इस दौरान उन्हें चिकित्सा फील्ड में कई बड़े काम किए। 83 साल की उम्र में 11 अप्रैल 2001 में उनका निधन हो गया।

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