गूगल में एक साल के अनुभव से टेकी दीक्षा अग्रवाल ने 12 सबक शेयर किए। उन्होंने सरल कोड, क्वालिटी, और यूजर-केंद्रित सोच पर जोर दिया। उनके अनुसार, 20-मिनट का नियम और समाधान खोजने की संस्कृति सफलता के लिए ज़रूरी है।

दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में से एक में एक साल काम करना सिर्फ आपके रिज्यूमे को भारी नहीं बनाता, बल्कि यह काम करने का आपका नजरिया भी पूरी तरह बदल सकता है। बेंगलुरु की टेकी दीक्षा अग्रवाल ने हाल ही में गूगल में अपना पहला साल पूरा किया है। इस मौके पर उन्होंने सोशल मीडिया पर अपने अनुभव से सीखे 12 बड़े सबक शेयर किए हैं। कोडिंग की आदतों से लेकर टीम के साथ काम करने के तरीकों तक, उनके ये अनुभव दुनिया के सबसे बेहतरीन इंजीनियरिंग कल्चर में आगे बढ़ने के लिए जरूरी सोच को दिखाते हैं।

स्मार्ट दिखने से ज्यादा जरूरी है सिंपल होना

दीक्षा ने अपने पहले साल के 12 सबसे जरूरी सबक बताते हुए कहा कि सादगी (simplicity) को हमेशा पहली प्राथमिकता देनी चाहिए। ऐसा कोड लिखना जो पढ़ने और मेंटेन करने में आसान हो, कोई बच्चों का खेल नहीं है। लेकिन लंबे समय में इसी का असली असर दिखता है। उनके मुताबिक, मुश्किल और स्मार्ट दिखने वाले कोड से कहीं ज्यादा कीमती सीधा और साफ-सुथरा कोड होता है।

छोटी सी गलती, लाखों यूजर्स पर भारी

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब कोई प्रोडक्ट पूरी दुनिया में इस्तेमाल होता है, तो छोटी-छोटी गलतियों का भी बहुत बड़ा असर पड़ता है। एक परसेंट की गलती भी लाखों यूजर्स के लिए परेशानी खड़ी कर सकती है। इसलिए, क्वालिटी के साथ कोई भी समझौता नहीं किया जा सकता।

टेस्टिंग: सिर्फ खानापूर्ति नहीं, मन की शांति है

दीक्षा कहती हैं कि टेस्टिंग को सिर्फ एक ड्यूटी की तरह नहीं, बल्कि भरोसे की गारंटी के तौर पर देखना चाहिए। अच्छी तरह से की गई टेस्टिंग टीम को आत्मविश्वास देती है और लंबे समय तक सिस्टम को स्थिर बनाए रखती है।

छोटे बदलाव, बेहतर रिव्यू

उन्होंने गौर किया कि छोटे-छोटे पुल रिक्वेस्ट (pull requests) पर ज्यादा ध्यान से और बेहतर रिव्यू मिलते हैं, जबकि बड़े बदलावों को कई बार जल्दबाजी में मंजूरी मिल जाती है। इसलिए, एक-एक करके छोटे-छोटे बदलाव करना ज्यादा असरदार होता है।

'क्यों' का जवाब लिखना बहुत जरूरी

कोड यह तो दिखा देता है कि वह 'क्या' करता है, लेकिन कमेंट्स यह बताते हैं कि उसे 'क्यों' बनाया गया है। किसी भी फैसले के पीछे की वजह को डॉक्यूमेंट करना टीम में तालमेल के लिए बेहद जरूरी है। उन्होंने यह भी साफ किया कि किसी बदलाव के लिए अपनी राय देने से बेहतर है कि आप डेटा के साथ अपनी बात रखें।

20 मिनट का नियम

दीक्षा ने एक आदत बनाई है कि अगर वह किसी समस्या पर 20 मिनट से ज्यादा समय तक फंसी रहती हैं, तो वह मदद मांग लेती हैं। उनका मानना है कि इतनी बड़ी कंपनी में किसी न किसी ने उस समस्या का हल पहले ही निकाला होता है। इससे समय बचता है और बेवजह की झुंझलाहट से भी छुटकारा मिलता है।

गलती किसकी है, यह मुद्दा नहीं

जब भी कोई समस्या आती है, तो गूगल का वर्क कल्चर किसी पर दोष मढ़ने के बजाय समाधान खोजने पर जोर देता है। दीक्षा इस कल्चर की तारीफ करती हैं। उनका मानना है कि जिम्मेदारी लेने और सिस्टम को बेहतर बनाने पर ध्यान देना ही लंबे समय में सफलता की कुंजी है।

इम्पोस्टर सिंड्रोम: यह सबको होता है

दीक्षा कहती हैं कि इम्पोस्टर सिंड्रोम (यह महसूस करना कि आप इस काम के लायक नहीं हैं) एक आम अनुभव है, जो लगभग सभी को होता है। हर कोई यहां लगातार सीख ही रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि गैर-जरूरी कोड को हटाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि कोई नया फीचर बनाना।

यूजर ही सबकुछ है…

सभी तकनीकी फैसलों के केंद्र में यूजर का अनुभव होना चाहिए। टेक्नोलॉजी चाहे कितनी भी एडवांस क्यों न हो, अगर वह असल में लोगों की मदद नहीं कर रही है, तो उसका कोई मतलब नहीं है।

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