Work Life Balance: 2.5 लाख रुपये महीना कमाने के बावजूद युवक खुद को खाली और असंतुष्ट क्यों महसूस कर रहा है? कम सैलरी वाले दिनों की तुलना में अधिक कमाई के बाद उसकी जिंदगी में क्या बदलाव आए? युवक ने खुद को अपने बैंक अकाउंट का "ग्लोरिफाइड डेटा एंट्री क्लर्क" क्यों बताया?

Salary vs Happiness: पैसा और ज़िंदगी की खुशी के बीच क्या रिश्ता है? इस सवाल पर एक कॉर्पोरेट कर्मचारी की सोशल मीडिया पोस्ट ने नई बहस छेड़ दी है। इस शख्स ने रेडिट (Reddit) पर एक पोस्ट में बताया कि हर महीने 2.5 लाख रुपये की सैलरी मिलने के बावजूद उसकी ज़िंदगी बिल्कुल खाली और बेजान है। इस पोस्ट ने उन लोगों का ध्यान खींचा है जो मानते हैं कि सिर्फ ज़्यादा सैलरी से मन की शांति नहीं मिलती।

Add Asianetnews Hindi as a Preferred SourcegooglePreferred

'तब मैं और आज मैं'

इस युवक ने अपनी पोस्ट का टाइटल दिया, "महीने के 2.5 लाख कमा रहा हूं, लेकिन इतना कंगाल कभी महसूस नहीं हुआ। 25,000 कमाने वाला मैं ज़्यादा खुश था।" उसने बताया कि जब उसकी कमाई कम थी, तो छोटे-छोटे खर्चे भी ज़िंदगी में बड़ा रोमांच भर देते थे। लेकिन जैसे-जैसे कमाई बढ़ी, ज़िंदगी का वो पुराना जोश खत्म हो गया। युवक ने पूछा, "मैंने वो मुकाम हासिल कर लिया। हर महीने मेरे फोन पर मैसेज आता है: आपके अकाउंट में 2,50,000 रुपये क्रेडिट हो गए हैं। समाज के हर पैमाने पर मैं सफल हूं। मैं कामयाबी की चोटी पर हूं। फिर भी मुझे कुछ महसूस क्यों नहीं हो रहा?"

कम कमाई वाले दिनों को याद करते हुए उसने लिखा, "जब महीने के 25,000 रुपये मिलते थे, तो ज़िंदगी में एक अलग ही नशा था। उस समय 500 रुपये का एक साधारण डिनर भी मेहनत से मिली एक बड़ी जीत जैसा लगता था। एक नई शर्ट खरीदना किसी त्योहार जैसा होता था। तब हर रुपये का एक मकसद था और पूरी आज़ादी भी। मैं सच में जी रहा था।"

'अपने ही बैंक अकाउंट का एंट्री क्लर्क'

कर्मचारी ने खुद को अपने ही बैंक अकाउंट का 'ग्लोरिफाइड डेटा एंट्री क्लर्क' बताया। उसका कहना है कि जैसे ही सैलरी अकाउंट में आती है, उसका आधा हिस्सा निवेश, म्यूचुअल फंड और इमरजेंसी फंड में चला जाता है। "मैं भविष्य के किसी ऐसे अनजान शख्स के लिए यह सब बचा रहा हूं, जिसे मैं जानता तक नहीं। लेकिन इसके लिए मैं आज के 'मैं' को भूखा मार रहा हूं। सिर्फ एक बैंक बैलेंस के नंबर के लिए मैं अपनी जवानी, शांति और हफ्ते के 40 से ज़्यादा घंटे बेच रहा हूं। अपनी खुशी पर खर्च करने के लिए कुछ बचता ही नहीं। मैं अपनी ही ज़िंदगी में एक दर्शक बनकर रह गया हूं, इसे कैसे रोकूं?"

लोगों ने दिए खर्च करने के तरीके

यह पोस्ट वायरल होते ही सोशल मीडिया पर तरह-तरह के रिएक्शन आने लगे। कुछ लोगों ने युवक की मानसिक हालत को समझा, तो कुछ ने इस संकट से निकलने के लिए प्रैक्टिकल सलाह दी। कुछ ने कहा कि ज़िंदगी का मज़ा लो, पैसे खर्च करो और विदेश यात्रा पर जाओ। इससे और ज़्यादा कमाने की इच्छा फिर से जागेगी। कुछ लोगों ने बताया कि यह एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जहां कमाई बढ़ने के साथ-साथ पैसे से खरीदी जाने वाली खुशी का असर कम होने लगता है।

एक और यूज़र ने निराशा में लिखा, “मेरी सैलरी महीने के 50,000 रुपये है। तुम तो फिर भी पैसा कमाकर निवेश कर पा रहे हो, मैं तो वो भी नहीं कर पाता। पूरे महीने मेहनत करता हूं और सैलरी आते ही सब खत्म हो जाता है। कभी-कभी ज़िंदगी से इतना थक जाता हूं कि लगता है बस हमेशा के लिए सो जाऊं।”