Punjab Election 2022: चुनावी रैलियों पर रोक, प्रचार के लिए उम्मीदवारों ने लिया सोशल मीडिया का सहारा

| Jan 30 2022, 05:26 AM IST

Punjab Election 2022: चुनावी रैलियों पर रोक, प्रचार के लिए उम्मीदवारों ने लिया सोशल मीडिया का सहारा

सार

पंजाब के चुनाव में इस बार सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। रैलियों पर रोक लगने के बाद उम्मीदवार सोशल प्लेटफार्म से अपनी बात रख रहे हैं। आप आदमी पार्टी, कांग्रेस और अकाली दल ने तो बाकायदा आईटी सेल बना कर इसमें आईटी विशेषज्ञों की टीम नियुक्त कर रखी है। 

चंडीगढ़। पंजाब के चुनाव (Punjab Election 2022) में इस बार सोशल मीडिया का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। रैलियों पर रोक लगने के बाद उम्मीदवार सोशल प्लेटफार्म से अपनी बात रख रहे हैं। आप आदमी पार्टी, कांग्रेस और अकाली दल ने तो बाकायदा आईटी सेल बना कर इसमें आईटी विशेषज्ञों की टीम नियुक्त कर रखी है। 

पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने अमृतसर में अपना आईटी सेल बना रखा है। यहां से वह एक यूट्यूब चैनल 'जितेगा पंजाब' चला रहे हैं। विधायक सुनील दत्त के बेटे आदित्य दत्त अपने पिता का आईटी सेल देख रहे हैं। उन्होंने बताया कि इससे वह लगातार मतदाताओं  से संपर्क साधे हुए हैं। वह मानते हैं कि अब सोशल मीडिया के बिना नेता का काम करना मुश्किल है। अपनी बात रखने के लिए इस प्लेटफार्म से ज्यादा तेज अभी तक कुछ भी नहीं है। 

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आज राज्य का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं, जहां सोशल मीडिया की पहुंच न हो। गांव, यहां तक कि झुग्गी-झोपड़ी तक सोशल मीडिया पहुंच गया है। नेताओं को भी इस बात का पता है। अब जबकि कोरोना संक्रमण भी है। इस वजह से तेजी से मतदाता तक संपर्क बनाने का यह सबसे कारगर तरीका है। 

यही कारण है कि कांग्रेस के इंदरबीर सिंह बुलारिया, आप के इंद्रबीर सिंह निज्जर, शिअद के तलबीर सिंह गिल भी मतदाताओं तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं। पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के राजकुमार वेरका, शिअद के डॉ. दलबीर सिंह और आप के जसबीर सिंह मतदाताओं से हर रोज रूबरू हो रहे हैं। इसके लिए  फेसबुक और व्हाट्सएप का इस्तेमाल करते हैं। 

एक पार्टी को आईटी सेवाएं दे रहे मोहित अग्रवाल ने बताया कि कोरोना के चलते न तो रैलियां हो रही हैं और न ही राजनीतिक दल रोड शो के जरिए जनता को अपनी ताकत दिखा पा रहे हैं। इस वजह से पूरा चुनाव प्रचार डिजिटल हो गया है। चुनाव आयोग के प्रतिबंध के कारण राजनीतिक दल और नेता इंटरनेट मीडिया के विभिन्न मंचों के माध्यम से जनता तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। इन मंचों पर अपनी प्रचार सामग्री परोसकर पार्टियां चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत करने का काम कर रही हैं। 

चुनाव प्रचार का मुख्य माध्यम बना इंटरनेट मीडिया 
मोहित अग्रवाल ने बताया कि अब तो पार्टियां आरोप प्रत्यारोप भी डिजिटल सिस्टम से लगा रहे हैं। इसके लिए गीतों और ग्राफिक्स का इस्तेमाल किया जाता है। आज के परिवेश में इंटरनेट मीडिया चुनाव प्रचार का मुख्य माध्यम बन गया है। चंडीगढ़ के साइबर सिटी में आईटी कंपनी चला रहे हिमांशु चोपड़ा ने इन दिनों राजनीति पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि इन दिनों उनके पास समय नहीं है। पार्टियां तो आईटी पेशेवरों को हायर कर रही हैं, इसके साथ ही कई उम्मीदवारों ने अलग से उनकी सेवाएं ली है। हम एक टीम की तरह काम करते हैं। इसमें वीडियो, ग्राफिक्स, कंटेंट राइटर के साथ एससीओ के लोग भी काम करते हैं। 

हम यह देखते है कि आज किस मुद्दे पर पूरा दिन ट्रैफिक जनरेट करनी है। उसी टॉपिक को उठाते हैं। कई बार नेता भी बता देते हैं कि इस पर काम करना है। हम उनकी प्रेस कांफ्रेंस लाइव करने के साथ उन्होंने विकास के जो काम कराए हैं, उसे सोशल मीडिया पर डालते हैं। इसके साथ ही प्रतिद्वंद्वी की नेगेटिव बातों को उठाते हैं, जिससे हम ज्यादा से ज्यादा लोगों को इंगेज कर सकें। इसके साथ एसएमएस और सोशल मीडिया की ऐड पर भी काम करते हैं। 

हिमांशु ने बताया कि एक पार्टी के साथ 50 से लेकर 80 लोगों की टीम काम करती है, जबकि उम्मीदवार के साथ पांच से आठ लोग काम कर रहे हैं। इसके लिए बकायदा ऑफिस बनाए गए हैं। कई बार तो हम ऑनलाइन लाइव भी करते हैं। उन्होंने बताया कि हम शहर के लिए इंस्ट्राग्राम, फेसबुक और ट्विटर पर ज्यादा काम करते हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के लिए वाट्सअप और फेसबुक को ज्यादा तवज्जो देते हैं। सोशल मीडिया पर दिक्कत यह है कि युवाओं से तो पहुंच बन जाती है, लेकिन घरेलु महिलाएं और बुजुर्गों तक पहुंच बनाना काफी मुश्किल हो रहा है। फिर भी इंटरनेट पर जो पार्टी सबसे ज्यादा सक्रिय हैं, वह चुनाव प्रचार में भी सबसे आगे हैं। 

इंटरनेट पर प्रचार करने के कई फायदे हैं। सोशल मीडिया से पार्टियां मतदाता तक चुनावी घोषणापत्र, लोगों के लिए उनकी प्राथमिकताएं, जब वे सरकार बनाते हैं तो उनका विजन क्या होगा, जैसी जानकारी पहुंचाते हैं। क्योंकि तभी तो मतदाता यह तय करेगा कि किसे वोट करना है, लेकिन दिक्कत यह है कि इससे यह पता नहीं चलता कि लोग कितने जुड़े हैं। वर्चुअल प्लेटफार्म में लोगों की संख्या का पता नहीं चल पाता। सभा आदि से एक तरह का व्यक्तिगत जुड़ाव सा हो जाता है, लेकिन सोशल मीडिया पर व्यक्तिगत जुड़ाव नहीं हो पाता। फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि कोरोना ने चुनाव प्रचार के तौर तरीके को पूरी तरह से बदल दिया है। पंजाब का विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन कर उभर रहा है।

 

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