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'उड़न परी' हिमा दास बनीं DSP, बेहद गरीबी में पली ये आदिवासी लड़की कैसे बनी इतनी बड़ी स्टार?

First Published Feb 26, 2021, 6:56 PM IST
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करियर डेस्क. DSP Hima Das Success Story: भारत की 'उड़न परी' कही जाने वाली स्टार फर्राटा धाविका हिमा दास शुक्रवार को असम पुलिस में उप अधीक्षक (DSP) बन गई हैं। समारोह में असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने हिमा को नियुक्ति पत्र सौंपा। इस मौके पर पुलिस महानिदेशक समेत शीर्ष पुलिस अधिकारी और प्रदेश सरकार के अधिकारी मौजूद थे। पुलिस की वर्दी में हिमा के कांधे पर लगे सितारों ने उनकी कामयाबी और यहां तक पहुंचने के उनके संघर्ष में चार चांद लगा दिए हैं। सोशल मीडिया पर हिमा की जबरदस्त फैन फोलइंग है उन्होंने पदभार लेते ही फेसबुक पर तस्वीरें साझा कीं। साथ ही असम सीएम को दिल से धन्यवाद कहा। उन्होंने असम पुलिस को ज्वाइन करना बचपन का सपना सच होने जैसा बताया। DSP बनने के बाद भी उन्होंने कहा कि मेरा एथलेटिक्स करियर जारी रहेगा। आइए जानते हैं खेतों में टायर लेकर दौड़ने वाली ये आदिवासी लड़की आज इतनी बड़ी स्टार कैसे बनी है?

हिमा ने कहा कि वह बचपन से पुलिस अधिकारी बनने का सपना देखती आई हैं। उसने कहा, 'यहां लोगों को पता है। मैं कुछ अलग नहीं कहने जा रही। स्कूली दिनों से ही मैं पुलिस अधिकारी बनना चाहती थी और यह मेरी मां का भी सपना था।' उन्होंने कहा 'वह (हिमा की मां) दुर्गापूजा के दौरान मुझे खिलौने में बंदूक दिलाती थी। मां कहती थी कि मैं असम पुलिस की सेवा करूं और अच्छी इंसान बनूं।'

 

हिमा ने कहा कि वह बचपन से पुलिस अधिकारी बनने का सपना देखती आई हैं। उसने कहा, 'यहां लोगों को पता है। मैं कुछ अलग नहीं कहने जा रही। स्कूली दिनों से ही मैं पुलिस अधिकारी बनना चाहती थी और यह मेरी मां का भी सपना था।' उन्होंने कहा 'वह (हिमा की मां) दुर्गापूजा के दौरान मुझे खिलौने में बंदूक दिलाती थी। मां कहती थी कि मैं असम पुलिस की सेवा करूं और अच्छी इंसान बनूं।'

 

एशियाई खेलों की रजत पदक विजेता और जूनियर विश्व चैम्पियन हिमा ने कहा कि वह पुलिस की नौकरी के साथ खेलों में अपना करियर भी जारी रखेगी।

 

 

एशियाई खेलों की रजत पदक विजेता और जूनियर विश्व चैम्पियन हिमा ने कहा कि वह पुलिस की नौकरी के साथ खेलों में अपना करियर भी जारी रखेगी।

 

 

हिमा ने कहा, 'मुझे सब कुछ खेलों की वजह से मिला है। मैं प्रदेश में खेल की बेहतरी के लिए काम करूंगी और असम को हरियाणा की तरह सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला राज्य बनाने की कोशिश करूंगी। असम पुलिस के लिए काम करते हुए अपना कैरियर भी जारी रखूंगी।'

हिमा ने कहा, 'मुझे सब कुछ खेलों की वजह से मिला है। मैं प्रदेश में खेल की बेहतरी के लिए काम करूंगी और असम को हरियाणा की तरह सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला राज्य बनाने की कोशिश करूंगी। असम पुलिस के लिए काम करते हुए अपना कैरियर भी जारी रखूंगी।'

हिमा के यहां तक पहुंचने का सफर बेहद संघर्ष भरा है। हिमा का जन्म असम के नगांव जिले के धींग गांव में रहने वाले एक साधारण चावल परिवार में हुआ है। हिमा के पिता रंजीत और मां का नाम जोनाली है। इस गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकल हिमा दास ने न सिर्फ अपनी पहचान बनाई बल्कि पूरे गांव को दुनिया के अंधेरे से निकाल दिया। हिमा 9 जनवरी 2000 को जन्मी हैं और उनका करीब 17 लोगों का परिवार है। छह भाई-बहनों में वे सबसे छोटी हैं।

हिमा के यहां तक पहुंचने का सफर बेहद संघर्ष भरा है। हिमा का जन्म असम के नगांव जिले के धींग गांव में रहने वाले एक साधारण चावल परिवार में हुआ है। हिमा के पिता रंजीत और मां का नाम जोनाली है। इस गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकल हिमा दास ने न सिर्फ अपनी पहचान बनाई बल्कि पूरे गांव को दुनिया के अंधेरे से निकाल दिया। हिमा 9 जनवरी 2000 को जन्मी हैं और उनका करीब 17 लोगों का परिवार है। छह भाई-बहनों में वे सबसे छोटी हैं।

पूरा परिवार धान की खेती करता है। हिमा ने भी अब तक के जीवन का लंबा हिस्सा खेतों में बुआई और निराई करते बिताया है। हिमा अपने पिता के साथ खेतों पर काम करती थीं और खाली वक्त में खेत के पास मौजूद मैदान पर लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थीं। फुटबॉल में लड़कों को बराबरी से टक्कर देते देख युवा व खेल निदेशालय के कोच निपोन दास हिमा से काफी प्रभावित हुए। जिसके बाद उन्होंने हिमा को एथलीट बनने की सलाह दी।

पूरा परिवार धान की खेती करता है। हिमा ने भी अब तक के जीवन का लंबा हिस्सा खेतों में बुआई और निराई करते बिताया है। हिमा अपने पिता के साथ खेतों पर काम करती थीं और खाली वक्त में खेत के पास मौजूद मैदान पर लड़कों के साथ फुटबॉल खेलती थीं। फुटबॉल में लड़कों को बराबरी से टक्कर देते देख युवा व खेल निदेशालय के कोच निपोन दास हिमा से काफी प्रभावित हुए। जिसके बाद उन्होंने हिमा को एथलीट बनने की सलाह दी।

कोच की बात परिजनों को समझ तो आ गई लेकिन जरूरी ट्रेनिंग दिलाने के लिए हिमा के परिजनों के पास पैसा नहीं था। ऐसे में कोच ने उनकी मदद की और हिमा का संघर्ष शुरू हुआ। हिमा टायर बांधकर दौड़ा करती थीं। पैरों में फटे-पुराने जूते भी नहीं थे नंगे पैर ही रेस लगाया करती थीं। उनकी रफ्तार देख गांव में लड़के भी दंग रह जाते थे।

 

कोच की बात परिजनों को समझ तो आ गई लेकिन जरूरी ट्रेनिंग दिलाने के लिए हिमा के परिजनों के पास पैसा नहीं था। ऐसे में कोच ने उनकी मदद की और हिमा का संघर्ष शुरू हुआ। हिमा टायर बांधकर दौड़ा करती थीं। पैरों में फटे-पुराने जूते भी नहीं थे नंगे पैर ही रेस लगाया करती थीं। उनकी रफ्तार देख गांव में लड़के भी दंग रह जाते थे।

 

फिर एथलिट बनने हिमा घर से करीब 140 किलोमीटर दूर गुवाहाटी में चली गईं, जहां रहकर उन्होंने सारुसाजई स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स में ट्रेनिंग लेनी शुरू की। 18 साल की हिमा ने अपने करियर के पहले एथलेटिक्स कॉम्पटिशन में हिस्सा लिया था। तब उन्होंने असम के शिवसागर में हुई इंटर डिस्ट्रिक मीट में हिस्सा लिया था। उनकी लगन और मेहनत का यह नतीजा निकला कि इस साल अप्रैल में हुए गोल्डकोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए वे चुनी गईं। वहां उन्होंने 400 मीटर की दूरी 51.31 सेकंड में पूरी की थी। वे वहां छठे स्थान पर रही थीं।


उन्होंने पिछले महीने गुवाहाटी में हुई नेशनल इंटर स्टेट चैम्पियनशिप में अपनी बेस्ट परफॉर्मेंस दी थी। तब उन्होंने 400 मीटर की रेस 51.13 सेकंड में पूरी की थी। वे अब भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा के साथ एलीट क्लब में शामिल हो गई हैं। 

फिर एथलिट बनने हिमा घर से करीब 140 किलोमीटर दूर गुवाहाटी में चली गईं, जहां रहकर उन्होंने सारुसाजई स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स में ट्रेनिंग लेनी शुरू की। 18 साल की हिमा ने अपने करियर के पहले एथलेटिक्स कॉम्पटिशन में हिस्सा लिया था। तब उन्होंने असम के शिवसागर में हुई इंटर डिस्ट्रिक मीट में हिस्सा लिया था। उनकी लगन और मेहनत का यह नतीजा निकला कि इस साल अप्रैल में हुए गोल्डकोस्ट कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए वे चुनी गईं। वहां उन्होंने 400 मीटर की दूरी 51.31 सेकंड में पूरी की थी। वे वहां छठे स्थान पर रही थीं।


उन्होंने पिछले महीने गुवाहाटी में हुई नेशनल इंटर स्टेट चैम्पियनशिप में अपनी बेस्ट परफॉर्मेंस दी थी। तब उन्होंने 400 मीटर की रेस 51.13 सेकंड में पूरी की थी। वे अब भाला फेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा के साथ एलीट क्लब में शामिल हो गई हैं। 

हिमा दास ने फिर दुनियाभर में पहचान हासिल की। हिमा दास पहली भारतीय महिला एथलीट हैं, जिन्होंने किसी भी फॉर्मेट में गोल्ड मेडल जीता है। उन्होंने IAAF (International Association of Athletics Federations) विश्व U20 चैंपियनशिप में 51.46 सेकंड में यह उपलब्धि अपने नाम की। हिमा साल 2019 में पांच स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। हिमा ने 400 मीटर ट्रैक इवेंट रेस 51.46 सेकंड में पूरी की। ये पहला मौका था जब आईएएएफ के ट्रैक इवेंट में भारत की किसी एथलीट ने गोल्ड मेडल जीता है। इससे पहले भारत की कोई महिला एथलीट जूनियर या सीनियर लेवल पर वर्ल्ड चैम्पियनशिप में गोल्ड नहीं जीत सकी थी। जीत के बाद हिमा को गोल्ड मेडल देते वक्त जैसे ही भारत का राष्ट्रगान बजा तो उनकी आंखों में आंसू आ गए थे।

हिमा दास ने फिर दुनियाभर में पहचान हासिल की। हिमा दास पहली भारतीय महिला एथलीट हैं, जिन्होंने किसी भी फॉर्मेट में गोल्ड मेडल जीता है। उन्होंने IAAF (International Association of Athletics Federations) विश्व U20 चैंपियनशिप में 51.46 सेकंड में यह उपलब्धि अपने नाम की। हिमा साल 2019 में पांच स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। हिमा ने 400 मीटर ट्रैक इवेंट रेस 51.46 सेकंड में पूरी की। ये पहला मौका था जब आईएएएफ के ट्रैक इवेंट में भारत की किसी एथलीट ने गोल्ड मेडल जीता है। इससे पहले भारत की कोई महिला एथलीट जूनियर या सीनियर लेवल पर वर्ल्ड चैम्पियनशिप में गोल्ड नहीं जीत सकी थी। जीत के बाद हिमा को गोल्ड मेडल देते वक्त जैसे ही भारत का राष्ट्रगान बजा तो उनकी आंखों में आंसू आ गए थे।

Adidas ने बनाया ब्रांड अंबेसडर

 

एक समय बेहद गरीबी से जूझ रहीं हिमा के पास अच्छे जूते नहीं थे। उनकी ट्रेनिंग चल रही थी लेकिन ट्रेनिंग के लिए अच्छे जूतों नहीं थे। हिमा ने मांगे नहीं लेकिन पिता गुवाहाटी जाकर 1200 के जूते खरीदकर लाए थे। हिमा को जरूरत थी लेकिन इतने महंगे जूते खरीदना उनके परिवार के लिए बेहद मुश्किल था। फिर स्टार बनने के बाद जूते की कंपनी ADIDAS ने सितंबर 2018 में एक चिट्ठी लिखकर हिमा दास को अपना एम्बेसडर बनाया था। उनका नाम ADIDAS के जूतों पर छपता है। आज हिमा खुद एक ब्रांड हैं।

Adidas ने बनाया ब्रांड अंबेसडर

 

एक समय बेहद गरीबी से जूझ रहीं हिमा के पास अच्छे जूते नहीं थे। उनकी ट्रेनिंग चल रही थी लेकिन ट्रेनिंग के लिए अच्छे जूतों नहीं थे। हिमा ने मांगे नहीं लेकिन पिता गुवाहाटी जाकर 1200 के जूते खरीदकर लाए थे। हिमा को जरूरत थी लेकिन इतने महंगे जूते खरीदना उनके परिवार के लिए बेहद मुश्किल था। फिर स्टार बनने के बाद जूते की कंपनी ADIDAS ने सितंबर 2018 में एक चिट्ठी लिखकर हिमा दास को अपना एम्बेसडर बनाया था। उनका नाम ADIDAS के जूतों पर छपता है। आज हिमा खुद एक ब्रांड हैं।

2018 में कॉमनवेल्थ गेम्स के समय हिमा की बोर्ड परीक्षाएं होने वाली थी लेकिन घरवालों ने कहा कि खेलने का ऐसा मौका 4 साल के बाद ही मिलेगा, बोर्ड परीक्षा अगले साल भी हो सकती हैं। हिमा की उलझन दूर हुई। कॉमनवेल्थ में 400 मीटर की रेस में वे छठे स्थान पर रहीं। अगले साल उन्होंने परीक्षा दी और 2019 में हिमा ने फर्स्ट डिविजन से बारहवीं की परीक्षा पास की थी।

 

2018 में कॉमनवेल्थ गेम्स के समय हिमा की बोर्ड परीक्षाएं होने वाली थी लेकिन घरवालों ने कहा कि खेलने का ऐसा मौका 4 साल के बाद ही मिलेगा, बोर्ड परीक्षा अगले साल भी हो सकती हैं। हिमा की उलझन दूर हुई। कॉमनवेल्थ में 400 मीटर की रेस में वे छठे स्थान पर रहीं। अगले साल उन्होंने परीक्षा दी और 2019 में हिमा ने फर्स्ट डिविजन से बारहवीं की परीक्षा पास की थी।

 

हिमा, किसी भी ग्लोबल ट्रैक इवेंट में गोल्ड का तमगा झटकने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी हैं। एले इंडिया, फेमिना, वोग जैसी मैगजीनों के कवर पर चमकने वाली लड़की। हिमा ने हर मुश्किल हालातों को चुनौती देकर अपनी जगह हासिल की है अपने हुनर के दम पर। 25 सितंबर 2018 को हिमा दास को अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया था।

 

 

हिमा, किसी भी ग्लोबल ट्रैक इवेंट में गोल्ड का तमगा झटकने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी हैं। एले इंडिया, फेमिना, वोग जैसी मैगजीनों के कवर पर चमकने वाली लड़की। हिमा ने हर मुश्किल हालातों को चुनौती देकर अपनी जगह हासिल की है अपने हुनर के दम पर। 25 सितंबर 2018 को हिमा दास को अर्जुन अवॉर्ड से नवाजा गया था।

 

 

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