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बॉलीवुड में आने से पहले अमरीश पुरी ने एक बीमा कंपनी में काम करते थे। यहां उन्होंने करीब 2 दशक तक काम किया। उन्होंने 21 सालों की नौकरी बॉलीवुड में आने और अपने एक्टिंग के शौक को पूरा करने के लिए छोड़ दी थी। 

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बता दें कि उन्हें थिएटर का शौक पहले से था लेकिन कोई खास मौका नहीं मिल पा रहा था। वहीं एक वक्त ऐसा आया, जब उन्हें प्ले भी मिला और उन्होंने एक थिएटर आर्टिस्ट के तौर पर अपनी पहचान भी बनाई। थिएटर में काम और नाम कमाने के बाद उन्होंने बॉलीवुड में किस्मत आजमाने की सोची, हालांकि, उनके लिए यह सफर आसान नहीं था। 

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अमरीश के बड़े भाई मदन पुरी और चमन पुरी पहले से ही फिल्म इंडस्ट्री में थे और उन्होंने ही अमरीश को मुंबई को बुलाया था। पहली बार एक्टर के लिए उनका स्क्रीन टेस्ट 1954 में हुआ, लेकिन प्रोड्यूसर्स को वे पसंद नहीं आए। उन्हें एक्टिंग करने का जुनून था और यही कारण था कि प्रोड्यूसर्स के ठुकराने के बाद भी उन्होंने एक्टिंग को नहीं छोड़ा और थिएटर की तरफ रुख किया।

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1970 में उन्होंने देव आनंद की फिल्म 'प्रेम पुजारी' में छोटा सा रोल प्ले किया था। 1971 में डायरेक्टर सुखदेव ने उन्हें 'रेशमा और शेरा' के लिए साइन किया, उस वक्त तक उनकी उम्र 40 साल के करीब हो चुकी थी। हालांकि, फिल्म में अमरीश को ज्यादा रोल नहीं दिया गया, जिस वजह से उन्हें अपनी पहचान बनाने में और समय लगा।

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अमरीश को श्याम बेनेगल की फिल्म 'निशांत', 'मंथन' और 'भूमिका' जैसी फिल्मों में काम मिला। उनको असली पहचान 1980 में आई 'हम पांच' से मिली। इस फिल्म में उन्होंने दुर्योधन का किरदार निभाया था, जो काफी चर्चित रहा।

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1987 में आई 'मिस्टर इंडिया' में उन्होंने 'मोगैंबो' का किरदार निभाया। इस फिल्म में उनका डायलॉग 'मोगैंबो खुश हुआ' काफी फेमस हुआ। फिल्मों में विलेन का किरदार निभाने के बाद उन्होंने कभी मुड़कर नहीं देखा। फिल्मों में विलेन का किरदार निभाने के अलावा उन्होंने कई पॉजिटिव रोल भी प्ले किए।

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अमरीश पुरी ने एक से बढ़कर एक किरदार निभाए थे और उनकी एक्टिंग की डंका हॉलीवुड तक बजा। खबरों की मानें तो जब फिल्म 'इंडियाना जोन्स एंड द टेंपल ऑफ डूम' के लिए हॉलीवुड डायरेक्टर स्टीवन स्पीलबर्ग ने अमरीश पुरी को ऑडिशन देने के लिए अमेरिका बुलाया तो उन्होंने साफ मना कर दिया था। इतना ही नहीं उन्होंने स्टीवन को कहा था कि अगर ऑडिशन लेना है तो खुद भारत आएं। बाद में उन्होंने इस फिल्म में मोलाराम का रोल किया। 

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कई बार ऐसा भी होता था कि मनचाही फीस न मिलने पर वो फिल्म छोड़ दिया करते थे। एनएन सिप्पी की एक फिल्म उन्होंने सिर्फ इसलिए छोड़ दी थी, क्योंकि उन्हें मांग के मुताबिक 80 लाख रुपए नहीं दिए जा रहे थे। अमरीश ने इंटरव्यू में कहा था- जो मेरा हक है, वो मुझे मिलना चाहिए। मैं एक्टिंग के साथ कोई समझौता नहीं करता। तो फिल्म के लिए कम पैसा स्वीकार क्यों करूं। लोग मेरी एक्टिंग देखने आते हैं। प्रोड्यूसर्स को पैसा मिलता है, क्योंकि मैं फिल्म में होता हूं। तो क्या प्रोड्यूसर्स से मेरा चार्ज करना गलत है? 

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अमरीश पुरी को एक शौक भी था जिसके बारे शायद ही कोई जानता होगा। दरअसल, उनको तरह-तरह की हैट का कलेक्ट करना काफी पसंद था। उन्होंने कई देशों में यात्रा की और वो जहां भी जाते वहां से एक हैट जरूर खरीद लाते थे। उनके पास करीब 200 हैट का कलेक्शन था। बता दें कि अमरीश पुरी अब हमारे बीच नहीं है। 

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अमरीश पुरी के बारे में बताया जाता था कि उनकी कामयाबी के पीछे अनुशासन का बड़ा हाथ था। वो सिर्फ एक्टिंग को काम की तरह ही नहीं करते थे बल्कि उसमें रम जाते थे। सिर्फ एक्टिंग ही नहीं उनकी दमदार आवाज ने भी लोगों पर अपना प्रभाव छोड़ा। वो अपनी आवाज पर भी घंटों प्रैक्टिस करते थे।

 

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