क्या लाल किले पर फहराया गया खालिस्तानी झंडा? जानिए क्या है इस झंडे की असली कहानी
नई दिल्ली. कृषि कानून के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों ने गणतंत्र दिवस पर जमकर उत्पाद मचाया। यहां तक कि अलग अलग बॉर्डर से राजधानी दिल्ली में दाखिल हुए किसान लाल किले तक पहुंच गए। यहां किसानों ने विरोध करते हुए एक झंडा लाल किले पर फहराया। अब इसे लेकर बहस छिड़ गई है। कुछ लोग इसे खालिस्तानी झंडा तक बता रहे हैं। हालांकि, यह सच नहीं है। यह धार्मिक ध्वज 'निशान साहिब' है। जानिए जानते हैं इसका क्या इतिहास है?

सिख धर्म में निशान साहिब को पवित्र ध्वज माना जाता है। यह त्रिकोणीय ध्वज कपास या रेशम के कपड़े का बना होता है। इसमें खंडा चिह्न भी होता है। यह नीले रंग से बना होता है। ध्वजडंड के कलश पर छपा खंडा इस बात का प्रतीक है कि सिख के अलावा किसी भी धर्म का व्यक्ति धार्मिक स्थल में प्रवेश कर सकता है।
खालसा पंथ में निशान साहिब को पारंपरागत चिह्न बताया गया है। बैसाखी पर इसे नीचे उतारा जाता है और इसे दूध और जल से पवित्र किया जाता है। सिख समुदाय में निशान साहिब का बहुत सम्मान भी है।
पहले निशान साहिब लाल रंग का था। बाद में इसे सफेद कर दिया गया। बाद में इसे केसरिया रंग का किया गया। गुरु हरगोबिन्दजी ने 1709 में सबसे पहले अकाल तख्त पर केसरी रंग का निशान साहिब फहराया था।
ट्रैक्टर रैली में हुई हिंसा
इससे पहले किसान तय किए हुए रूट के अलावा अन्य जगहों से भी दिल्ली में दाखिल हुए। इस दौरान कई जगहों पर पुलिस और किसानों के बीच भिड़ंत हुई। इतना ही नहीं किसानों ने कई जगह हिंसा की। इसके अलावा पुलिसकर्मियों पर भी निशाना बनाया।
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