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अहमदाबाद ब्लास्ट के वो 38 गुनहगार, जिन्हें 13 साल बाद मिली सजा-ए-मौत, कोई यूपी से तो किसी के पुणे से जुड़े तार
अहमदाबाद : 13 साल पहले गुजरात (Gujrat) के अहमदाबाद (Ahmedabad) को मिले जख्म का इंसाफ शुक्रवार को अदालत ने कर दिया। गुनहगारों को विशेष अदालत ने उनके आतंक की सजा दे दी है। 49 दोषियों में से 38 को सजा-ए-मौत दी गई है जबकि 11 आखिरी सांस तक सलाखों के पीछे रहेंगे। देश के इतिहास में यह सबसे बड़ी सजा है। पहली बार इतनी बड़ी संख्या में किसी केस में फांसी की सजा दी गई है। कुल 7015 पेज का फैसला आया है। इससे पहले सत्र न्यायालय के न्यायाधीश एआर पटेल ने 8 फरवरी को फैसला सुनाते हुए 49 आरोपियों को दोषी करार दिया था। आइए आपको बताते हैं एक-एक गुनहगारों के बारें में जिन्हें उनके गुनाहों की सजा दी गई है।

26 जुलाई 2008 का वो काला दिन। शाम को बाजार गुलजार थे और लोग अपनी रोजमर्जा की जिंदगी में व्यस्त। हर कोई अगले ही पल होने वाले खतरे से अंजान था। शाम के साढ़े 6 बजे होंगे कि तभी बाजार में अचानक जोरदार धमाका हुआ, लोग कुछ समझ पाते कि तब तक एक के बाद एक सिलसिलेवार 21 धमाके हुए। 45 मिनट में सब कुछ तबाह हो गया था, 56 लोग मारे जा चुके थे, 260 लोग जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे थे।
8 फरवरी 2022 को कोर्ट ने 78 में से 49 आरोपियों को UAPA के तहत दोषी करार दिया था। इनमें से एक दोषी को जांच में मदद करने और 29 आरोपी सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया था। कोर्ट ने धमाकों में मारे गए लोगों के परिजनों को एक लाख, गंभीर घायलों को 50 हजार और मामूली घायलों को 25 हजार रुपए की सहायता देने का भी आदेश दिया है।
15 अगस्त 2008 को गुजरात पुलिस ने 11 लोगों को गिरफ्तार किया, जिससे इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिदीन की साजिश का पता चला। सिमी के तत्कालीन सदस्यों ने पाकिस्तान (Pakistan) में मौजूद एजेंसियों और अंडरवर्ल्ड की मदद से भारत में सिलसिलेवार विस्फोटों को अंजाम दिया था।
विस्फोट से कुछ मिनट पहले, टेलीविजन चैनलों और मीडिया को एक ई-मेल मिला था, जिसे कथित तौर पर 'इंडियन मुजाहिदीन' (Indian Mujahideen) ने धमाकों की चेतावनी दी थी। ब्लास्ट के बाद गुजरात (Gujrat) की सूरत पुलिस ने 28 जुलाई और 31 जुलाई 2008 के बीच शहर के अलग-अलग इलाकों से 29 बम बरामद किए।
कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई पिछले साल सितंबर में पूरी कर ली थी। दिसंबर 2009 में शुरू हुए इस मुकदमे में 1100 लोगों की गवाही हुई। सबूत नहीं मिलने की वजह से 28 लोगों को बरी कर दिया गया। करीब 13 साल तक इस मामले की जांच और सुनवाई चली है। लॉकडाउन के दौरान भी इस मामले की सुनवाई लगातार चलती रही। देश में पहली बार एक साथ 49 आरोपियों को आतंकवाद के गुनाह में दोषी ठहराया गया है। मामले की पूरी सुनवाई में अब तक सात जज बदल गए। अब आज इस केस के गुनहगारों को सजा दी जाएगी।
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