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ये है राजस्थान की पहली स्काईडाइवर: 10 साल की उम्र से किया एडवेंचर, 13000 फीट की ऊंचाई से लगाई छलांग

सीकर. गांव में रहने वाली एक 10 साल की लड़की को लाइफ में हमेशा से ही एडवेंचर करने का शौक था। कभी वह गांव के ऊंचे पेड़ों पर चढ़ती। तो कभी हाइट पर बैठ जाती। लड़की ने 11 साल की उम्र में मोटरसाइकिल और 13 साल की उम्र में कार चलाना सीख। उम्र बढ़ने के साथ-साथ धीरे-धीरे एडवेंचर का यह शौक लगातार बढ़ता गया। तो लड़की ने स्काईडाइविंग की। जब हजारों फीट की ऊंचाई पर पहुंची तो उसे वहीं अपनी दुनिया दिखने लगी। अब उसी लड़की ने महज 19 साल की उम्र में स्काई डाइविंग में USPA का A और B कैटेगरी का लाइसेंस लिया है। इस लड़की का नाम है सरोज कुमारी। वो राजस्थान के सीकर की रहने वाली हैं। आइए जानते कैसे सरोज ने इस मुकाम को हासिल किया।   

7 Min read
Author : Pawan Tiwari
| Updated : Jul 30 2022, 10:23 AM IST
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बचपन से ही था एडवेंचर का शौक
दरअसल, सरोज का जन्म सीकर के लोसल इलाके के सांगलिया गांव में हुआ था। सरोज को बचपन से ही एडवेंचर करने का शौक था। 10 साल की उम्र में वह गांव के ऊंचे ऊंचे पेड़ों पर चढ़ जाती। तो कभी ऊंची हाइट  पर बिना किसी सहारे के बैठे रहती। पिता किशोर कुमार पेशे से बिल्डर हैं। ऐसे में 10 साल की उम्र में परिवार जयपुर शिफ्ट हो गया। इसके बाद भी सरोज का यह एडवेंचर जारी रहा। जयपुर में रहकर 11 साल की उम्र में उसने बाइक और 13 साल की उम्र में मोटरसाइकिल चलाना सीख लिया। सरोज पढ़ाई में भी होशियार रही। उसने अपने 12th तक पढ़ाई पूरी की। एडवेंचर के शौक के चलते उसे अपने बर्थडे पर स्काईडाइविंग की इच्छा थी। 19 वें बर्थडे से पहले उसने अपने घर वालों को यह बात बताई।

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घर वालों ने भी उसका काफी सपोर्ट किया। पिता किशोर कुमार ने इसके लिए हरियाणा के नारनौल के ड्रॉप जोन में बुकिंग की। जो 8 अक्टूबर की हुई। पहली बार सरोज ने ड्रॉप जोन के इंस्पेक्टर ऐश्वर्य के साथ 13000 फीट की ऊंचाई से स्काईडाइविंग की। उस दौरान सरिता ने जोर से चिल्लाया कि मुझे हमेशा यही रहना है। तो इंस्पेक्टर ने कहा कि मेरी छोटी सी दुनिया में आपका स्वागत है। उसी दिन सरोज ने ठान लिया कि मुझे अब एक बार और स्काईडाइविंग करनी है। तो उसने यह बात इंस्पेक्टर ऐश्वर्य को बताई।

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2 दिनों तक ली ग्राउंड ट्रेनिंग
ऐसे में इंस्पेक्टर ऐश्वर्य ने उसे कहा कि इसके लिए वह सोलो स्टेटिक लाइन कोर्स कर सकती है। जनवरी 2022 में सरोज वापस कोर्स करने के लिए हरियाणा के नारनौल गई। जहां उसे इंस्पेक्टर डॉक्टर राजकुमार बालाकृष्णन ने अन्य 9 लोगों के साथ 2 दिन तक ग्राउंड ट्रेनिंग दी। जिसमें उसे बताया गया कि किस तरह से पैराशूट खोलना है और नीचे उतरना है। इसके बाद इंस्पेक्टर के साथ एक बार वापस सरोज ने स्काईडिविंग की। ट्रेनिंग करने के बाद सरोज घर चली गई। जहां से वह बीटेक करने के लिए मुंबई के कॉलेज में चली गई। मार्च 2022 में सरोज का वापस स्काईडाइविंग करने का मन हुआ तो उसने अपने घर वालों को यह बात बताई। कुछ दिनों बाद ही सरोज नारनौल आई।
 

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यहां उसने एक बार 6000 फीट की ऊंचाई से स्काईडाइविंग की। और वापस अपने कॉलेज चली गई। लेकिन उसका स्काईडाइविंग करने का यह शौक जारी रहा। ऐसे में उसने लाइसेंसड स्काईडाइविंग करने की सोची। लेकिन यहां USPA ( यूनाइटेड स्टेट्स पैराशूट एसोसिएशन) का लाइसेंसी नहीं मिल पाता। ऐसे में जून 2022 में वह कोर्स करने के लिए थाईलैंड चली गई। 20 जून से उसका 1 महीने का कोर्स से शुरू हुआ। जिसमें उसने टोटल 50 बार 13000 फीट की ऊंचाई से स्काईडाइविंग की। 20 जुलाई को सरोज का कोर्स पूरा हो गया। कोर्स पूरा करने पर उसे A और B कैटेगरी का लाइसेंस मिला। अब वह पूरे विश्व में किसी भी ड्रॉपजोन में सोलो स्काई डाइविंग कर सकती है।
 

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C कैटेगरी का लाइसेंस 
सरोज ने बताया कि कोर्स में उसे 25 बार स्काईडाइविंग करने के बाद ए कैटेगरी का लाइसेंस मिल गया। लेकिन उसे भी C कैटेगरी का लाइसेंस भी लेना था। ऐसे में वह और कुछ दिन थाईलैंड ही रुकी। और B-CATEGORY का लाइसेंस लेने के लिए 25 बार और स्काईडाइविंग की। सरोज ने बताया कि हालांकि दोनों लाइसेंस में कोई फर्क नहीं होता है। लेकिन अब उसे स्काईडाइविंग में और आगे जाना है। तो वह सी कैटेगरी का लाइसेंस लेना चाहती है। जिसके लिए उसे टोटल 200 बार स्काईडाइविंग करनी होगी। सी कैटेगरी का लाइसेंस लेने पर वह हेलमेट पर कैमरा लगा भी सकेगी। और स्काई डाइविंग करने वालों को डाइव करने से पहले हवा आदि के बारे में जानकारी दे सकेगी। इसके बाद वह डी कैटेगरी का लाइसेंस हासिल कर इंस्पेक्टर का कोर्स कर स्काइ डाइव करने वाले स्टूडेंट्स को कोच के तौर पर ट्रेन कर सकती है। सरिता ने बताया कि इंस्ट्रक्टर का कोर्स सी कैटेगरी का लाइसेंस मिलने पर भी किया जा सकता हैं। 

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सरोज ने बताया कि उसकी एक केटेगरी का कोर्स 9 जुलाई को ही पूरा हो गया था जिसमें उसने टोटल 25 बार स्काईडाइविंग की। जिसमें पहली और दूसरी बार स्काईडाइविंग में उसके साथ दो इंस्पेक्टर, तीसरी बार में एक इंस्पेक्टर ने पकड़े रखा। तीन डाई पूरी होने के बाद आठवीं डाइव तक इंस्पेक्टर साथ डाइव करते। लेकिन कभी पकड़ते नहीं। इसके बाद वह सभी डाइव में अकेले ही फ्लाइट से नीचे कूदी और डाइव की। सरोज ने बताया कि ए कैटेगरी की 25 डाइव में उसे 5500 फीट और बी कैटेगरी में 3300 फीट की ऊंचाई पर अपना पैराशूट खोलना होता था।
 

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सरोज ने बताया कि इस कोर्स में उनका सबसे यादगार पल उनकी 25वीं डाइव रही। जब वह डाइव करने के लिए प्लेन से नीचे कूदी तो आसमान में एक बड़ा सा रैंबो बना हुआ था। जिसके पीछे से वह नीचे आई। उस वक्त सनसेट का टाइम था। ऐसे में आसमान भी पूरी तरह से लाल था। सरोज कहती है कि उसे यह पल हमेशा याद रहेगा।
 

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सरोज ने बताया कि 15000 फीट ऊंचाई ज्यादा स्काईडाइव करने पर उन्हें प्लेन में ऑक्सीजन की जरूरत रहती है। ऑक्सीजन लेने के बाद इतनी ऊंचाई से स्काईडाइव की जा सकती है। सरोज ने बताया कि यदि किसी कारण से उन्हें समुद्र में लैंड करना पड़े तो उसके लिए भी उन्हें बी कैटेगरी के कोर्स में ट्रेनिंग दी गई है। सरोज ने बताया कि कोर्स तभी पूरा होता है जब आप डाइव के दौरान 90 डिग्री, 180 डिग्री, 360 डिग्री, राइट टर्न और लेफ्ट टर्न जैसे मेन्यूवर पूरे करते हो। साथ ही ट्रेनिंग में 4000, 5000 और 3000 फीट की अलग-अलग ऊंचाई पर अपना पैराशूट खोलना होता है। साथ ही डाइव करने के बाद 10 सेकंड में 1000 फीट नीचे, उसके बाद हर 5 सेकंड में 1000 फीट नीचे आना होता है। टाइप करने के बाद पैराशूट खोलने के समय के बीच 55 सेकंड से 60 सेकंड का अंतर होना चाहिए। सरोज ने बताया कि ए कैटेगरी का कोर्स पूरा होने के बाद उसने अपने साथियों के साथ 2 वे, 3 वे, 4 वे, 5 वे जंप भी किए। जिसमें सभी एक साथ एक दूसरे को पकड़े हुए रहते थे। इन्हें फन जंप भी कहते हैं।
 

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मेडिटेशन पर भी किया फोकस
सरोज ने बताया कि उनके घर वालों ने कभी भी उन्हें इसके लिए मना नहीं किया। दादा जीवणराम, पिता किशोर और माता सुप्यार और बड़े भाई नरेंद्र ने भी उनका पूरा साथ दिया। सरोज ने बताया कि उनके माता-पिता और भाई पिछले 4 साल से मेडिटेशन कर रहे हैं। जिसके लिए उन्होंने जयपुर में हार्टफूलनेस मेडिटेशन सेंटर ज्वाइन किया हुआ है। सरोज भी अपने घर वालों के साथ यहां मेडिटेशन करने जाती थी। जहां उसके लिए सबसे ज्यादा हार्ट बेस मेडिटेशन कारगर रहा। जिससे उसका ध्यान एक जगह केंद्रित रहने लगा और मन भी शांत रहता। इसी मेडिटेशन से उसे क्या करना है इसका पहले पता चल गया। और जो नहीं करना उनके साथ कैसे डील करना है इस बारे में भी समझ में आ गया।

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सरोज ने बताया कि उनकी सबसे अच्छी मोटीवेटर उनकी मम्मी सुप्यार रही। जो हमेशा यह कहती थी कि कोई भी अपना भाग्य साथ नहीं लेकर आता है। हमें रोज हमारा भाग्य खुद बनाना होता है। जो हमारे केवल कामों पर निर्भर होता है। जब आप कॉन्फिडेंट है तो फिर चाहे कोई कुछ भी कहे आप उस काम को बखूबी तरीके से पूरा करें और हर एक दिन उस काम को पूरे जोश और एकाग्रता के साथ करें तो उसमे सक्सेज हो जायेंगे।

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About the Author

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Pawan Tiwari
BHU से मॉस कम्युनिकेशन की डिग्री लेने के बाद सात सालों से डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक पत्रकारिता के फील्ड में हूं। 2020 में पत्रिका ग्रुप द्वारा डिजिटल पत्रकारिता में श्रेष्ठ प्रदर्शन के लिए सम्मानित हो चुका हूं। धार्मिक-राजनैतिक किताबें पढ़ने की आदत है।

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