'हनुमान अंश' की चर्चा के बीच जानिए क्या रामायण की संजीवनी बूटी सच में मौजूद है? हिमालय की उन खास जड़ी-बूटियों पर मॉडर्न साइंस क्या कहती है। पढ़ें 5 वैज्ञानिक खुलासे।

Sanjeevani Booti in Himalayas: सिनेमाघरों में इन दिनों बस एक ही नाम गूंज रहा है, 'हनुमान अंश'। महज 1.8 से 2 करोड़ रुपए के छोटे से बजट में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सुनामी ला दी है। फिल्म की कहानी नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी हनुमान भक्ति से जुड़ी है। लेकिन इसकी इस जबरदस्त कामयाबी ने लोगों के दिलों में एक पुराना सवाल फिर से जिंदा कर दिया है, क्या रामायण काल में जिस संजीवनी बूटी को लाने के लिए हनुमान जी पर्वत उठा लाए थे, उसका कोई अंश आज भी हिमालय में मौजूद है? आज की मॉडर्न लैब और साइंटिस्ट्स की रिपोर्ट्स को देखें, तो जवाब सचमुच चौंकाने वाला है। आइए जानते हैं संजीवनी बूटी को लेकर वैज्ञानिकों ने अब तक क्या-क्या खोज निकाला है और 5 बड़े साइंटिफिक खुलासे...

संजीवनी बूटी को 'हनुमान अंश' क्यों कहा जाता है?

रामायण में जब मेघनाद के शक्ति बाण से लक्ष्मण जी मूर्छित हुए थे, तब हनुमान जी द्रोणागिरी पर्वत उठाकर संजीवनी बूटी लाए और उनके प्राण बचाए। इसलिए इस बूटी को कहीं-कहीं 'हनुमान अंश' भी कहा जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि हनुमान जी स्वयं 'चिरंजीवी' (अमर) और संकटमोचक हैं। यह बूटी भी मरणासन्न व्यक्ति में प्राण फूंकने का काम करती है, इसलिए लोक आस्था में इसे संकटमोचक हनुमान की ही दिव्य कृपा और शक्ति का रूप माना गया। मान्यता है कि जब हनुमान जी पर्वत को वापस ले जा रहे थे, तब उसके कुछ अंश उत्तराखंड और लद्दाख के हिमालयी इलाकों में गिरे। वहां उगने वाली दुर्लभ औषधियों को लोग आज भी हनुमान जी द्वारा लाए गए पर्वत का ही अंश मानते हैं।

'संजीवनी बूटी' से जुड़े 5 वैज्ञानिक रिसर्च

पूरी तरह सूखकर भी पानी मिलते ही जिंदा हो जाता है यह पौधा

हिमालय में मिलने वाले 'सिलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस' (Selaginella bryopteris) नाम के पौधे को आयुर्वेद में 'संजीवनी' माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि भयानक गर्मी या सूखे में यह पूरी तरह मुरझाकर भूरा और बेजान हो जाता है, बिल्कुल मरे हुए की तरह। लेकिन जैसे ही इस पर पानी की कुछ बूंदें गिरती हैं, ये कुछ ही घंटों में फिर से हरा-भरा और जिंदा हो जाता है। वैज्ञानिक इसे 'रीसरेक्शन प्लांट' (जी उठने वाला पौधा) कहते हैं। 2010 की एक रिसर्च में वैज्ञानिकों ने इसके सूखने और फिर पानी मिलने के बाद वापस एक्टिव होने की प्रक्रिया को डिटेल्स में देखा। रिसर्च के मुताबिक, पौधा बेहद कम पानी की स्थिति को सहन कर सकता है और दोबारा पानी मिलने पर उसकी फोटोसिंथेटिक एक्टिविटी यानी प्रकाश-संश्लेषण की गतिविधि (Photosynthetic Activity) तेजी से वापस आती है। यही वह खूबी है जिसने इस पौधे को बेहद खास बना दिया है।

सेल डैमेज और जहर के असर को बेअसर करने की ताकत

लैब में हुई कई स्टडीज में देखा गया कि इस पौधे के अर्क (एक्सट्रैक्ट) में जबरदस्त एंटीऑक्सीडेंट तत्व होते हैं। जब शरीर के सेल्स (कोशिकाएं) स्ट्रेस या बीमारी से मरने लगते हैं, तो यह उन्हें तेजी से ठीक करने में मदद करता है।रिसर्च बताती है कि यह जहरीले असर (टॉक्सिसिटी) से शरीर के जरूरी अंगों, खासकर लिवर और दिल को बचाने में काफी असरदार साबित हुआ है। 2005 में पब्लिश एक रिसर्च में सिलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस के अर्क (Extract) को अलग-अलग एक्सपेरिमेंटल सेल सिस्टम पर टेस्ट किया गया। वैज्ञानिकों ने पाया कि इसके अर्क (Aqueous Extract) में एंटी स्ट्रेस और एंटी-ऑक्सिडेंट एक्टिविटी जैसे गुण दिखाई दिए। कुछ लैब एक्सपेरिमेट्स में अर्क ने ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस और UV से होने वाले सेल डैमेज के खिलाफ प्रोटेक्टिव इफेक्ट भी दिखाया। यह बात इसलिए खास है क्योंकि ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस (Oxidative Stress) हमारे सेल्स को नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि यह पौधा इंसान को मौत से वापस ला सकता है। वैज्ञानिक रिसर्च में सेल या लैब लेवल पर दिखने वाला इफेक्ट इंसानों के इलाज का सबूत नहीं होता है।

रेडिएशन से शरीर की हिफाजत करने की कुदरती ढाल

एक और हैरान करने वाली वैज्ञानिक रिसर्च बताती है कि संजीवनी वर्ग के इन पौधों में खतरनाक अल्ट्रावॉयलेट (UV) किरणों और रेडियोएक्टिव रेडिएशन से सेल्स को बचाने की ताकत होती है। युद्ध या गंभीर घावों में जहां शरीर के ऊतक (टिश्यूज) तेजी से डैमेज होते हैं, वहां यह पौधा घाव भरने की रफ्तार को कई गुना तेज कर देता है।

लद्दाख का 'रोडियोला' बर्फ में सांस फूले तो यह है वरदान

संजीवनी की तलाश में डीआरडीओ (DRDO) के वैज्ञानिकों ने लद्दाख और तिब्बत के बर्फीले इलाकों में एक और पौधा ढूंढा, जिसका नाम रोडियोला (Rhodiola) है। स्थानीय लोग इसे 'सोलो' कहते हैं। रिसर्च में सामने आया कि यह पौधा शरीर की इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को कई गुना बढ़ा देता है। माइनस 40 डिग्री ठंड और ऑक्सीजन की भारी कमी वाले इलाकों में ये शरीर को जिंदा और एक्टिव रखने में कमाल का काम करता है। कई शोधकर्ता मानते हैं कि हनुमान जी जिस संजीवनी को लेने गए थे, उसके लक्षण रोडियोला से काफी मिलते-जुलते हैं।

अंधेरे में चमकने का रहस्य

रामायण में जिक्र आता है कि संजीवनी बूटी रात के अंधेरे में जुगनू की तरह चमकती है, इसलिए हनुमान जी को उसे पहचानने में परेशानी हुई थी। साइंस में इसे 'बायोल्यूमिनेसेंस' कहा जाता है। हालांकि, सिलाजिनेला खुद रोशनी नहीं फेंकता, लेकिन कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पत्तों पर पाए जाने वाले खास फंगस या कुछ दुर्लभ हिमालयी फर्न रात में हल्की चमक छोड़ते हैं।