नगड़ी गांव में एक कुएं में छठ पूजा होती है। मान्यता है कि जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए, तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा था। जिससे प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें अक्षय पात्र दिया था। द्रोपदी के व्रत के फल से पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया था। 

रांची : बिहार (bihar) और उत्तर-प्रदेश (uttar pradesh) के पूर्वांचल समेत देश के कई राज्यों में इन दिनों छठ महापर्व (Chhath Puja 2021) को लेकर काफी उत्साह है। झारखंड (jharkhand) में भी इसका जबरदस्‍त क्रेज है। अलग-अलग जगहों पर परंपरा भी अलग-अलग हैं।
छठ पूजाको लेकर कई कहानियां भी प्रचलित हैं। इन्‍हीं कहानियों में एक महाभारत काल से जुड़ी है। कहा जाता है कि रांची (ranchi) में एक गांव है, जहां द्रौपदी ने छठ पूजा की थी। यहां व्रती नदी और तालाब में नहीं बल्कि एक कुएं में अर्घ्य देती हैं। जानिए क्या है इसके पीछे की पौराणिक कथा..

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द्रौपदी ने की थी छठ पूजा
रांची के नगड़ी गांव में एक कुएं में छठ पूजा होती है। मान्यता है कि जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हार गए, तब द्रौपदी ने छठ का व्रत रखा था। द्रोपदी के व्रत के फल से पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया था। इस कथा के अनुसार एक बार जब पांडवों को प्यास लगी और दूर-दूर तक पानी नहीं मिला तब द्रौपदी के कहने पर अर्जुन ने जमीन में तीर मार कर पानी निकाला था। जमीन से जैसे ही पानी की धारा निकली, तो पांडव अपनी प्यास बुझाने के लिए आगे बढ़े, लेकिन उससे पहले ही द्रौपदी ने उन्हें रोक दिया। द्रौपदी ने पहले सूर्य देव को अर्घ्य दिया और सूर्यदेव से कहा कि हमारी इतनी कठिन परीक्षा लेने के लिए आपको भी अपना ताप सामान्य से अधिक बढ़ा लेना पड़ा होगा। इस जल से पहले आप शीतल हो लीजिए। यह कहते हुए द्रौपदी ने सूर्य देव को अर्घ्य दिया।

..और पांडवों को राजपाट वापस मिला
सूर्यदेव द्रौपदी की आस्था देखकर प्रसन्न हो गए और दृढ़ निश्चय और उसकी आस्था देखकर प्रसन्न हो गए और उन्होंने अपना तेज कम कर लिया। इसके बाद द्रौपदी और पांडवो ने सूर्य देव को रोजाना अर्घ्य देने शुरू कर दिया। इतना ही नहीं द्रौपदी कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को सूर्य देव की विशेष पूजा करती थी। जिससे प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उन्हें अक्षय पात्र दिया था। इसी व्रत के फल से पांडवों को अपना राजपाट वापस मिल गया था।

इसी गांव में था भीम का ससुराल
कुछ ऐसी भी मान्यता है कि इसी गांव में पांडवों के भाई भीम का ससुराल था और भीम और हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच का जन्म भी यहीं हुआ था। जिसने महाभारत के युद्ध में पांडवों की काफी मदद की थी। इस कारण भी इस गांव के लोग छठ को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। इस दिन गांव में कई परंपराओं का निर्वहन भी किया जाता है। 

गांव में दो नदियों का उद्गम स्थल है
एक दूसरी मान्यता के मुताबिक, महाभारत में वर्णित एकचक्रा नगरी नाम ही अपभ्रंश होकर अब नगड़ी हो गया है। स्वर्ण रेखा नदी दक्षिणी छोटा नागपुर के इसी पठारी भू-भाग से निकलती है। इसी गांव के एक छोर से दक्षिणी कोयल तो दूसरे छोर से स्वर्ण रेखा नदी का उद्गम होता है। स्वर्ण रेखा झारखंड के इस छोटे से गांव से निकलकर ओडिशा और पश्चिम बंगाल होती हुई गंगा में मिले बिना ही सीधी समुद्र में जाकर मिल जाती है। इस नदी का सोने से भी संबंध है। जिसकी वजह से इसका नाम स्वर्णरेखा पड़ा है। स्वर्ण रेखा नदी की कुल लंबाई 395 किलोमीटर से अधिक है। इसके साथ ही कोयल भी झारखंड की एक अहम और पलामू इलाके की जीवन रेखा मानी जाने वाली नदी है।

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