बनारस की साड़ियाँ सिर्फ़ कपड़ा नहीं, बल्कि एक समृद्ध परंपरा की कहानी हैं। मुग़लकाल से लेकर आज तक, इन साड़ियों का इतिहास, डिज़ाइन और पहचान, सब कुछ ख़ास है।

लाइफस्टाइल डेस्क. वाराणसी जिसे बनारस या काशी के नाम से भी जाना जाता है, यह सिर्फ एक आध्यात्मिक शहर ही नहीं बल्कि अपने वस्त्रकला के लिए भी जानी जाती है। गंगा किनारे बसे इस प्राचीन शहर की बनारसी साड़ियां दुनिया भर में मशहूर हैं। ये साड़ियां न केवल फैशन स्टेटमेंट होती हैं, बल्कि परंपरा का सम्मान भी करती हैं। शादी के मौके पर या खास अवसरों पर बनारसी साड़ी औरत की शान बढ़ा देती है।

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बनारसी साड़ी का इतिहास

शुरुआत में बनारसी साड़ियां रॉयल्टी के लिए बनाई जाती थीं। इनका इतिहास बहुत पुराना है, जिसमें सोने और चांदी के जरी के धागों का प्रयोक करके ब्रोकेड के डिजाइन बनाए जाते थे। मुगल काल के दौरान, खासकर अकबर के शासन में बनारसी साड़ियों में फारसी और भारतीय कला के मिश्रण देखा गया। बाद में 17वीं सदी में गुजरात से आए कारीगरों ने भी इसे रिच और खूबसूरत बनाने में योगदान दिया।

फैब्रिक, वजन और स्टाइल

बनारसी साड़ियां अपनी मजबूत बनावट, नाजुक कारीगरी और डिटेल्ड डिजाइनों के लिए फेमस है। समय के साथ इसमें कड़ी मेहनत और बारीकी से काम करने वाले कारीगरों ने इसे और भी खास बना दिया। बनारसी साड़ियों में कतान (शुद्ध रेशम), कोरा (ऑर्गेंज़ा), काधवा (डिज़ाइन वाली कढ़ाई) जैसी किस्में शामिल होती हैं। इनमें मीना (कलर इनले) और जरी का उपयोग बहुतायत में होता है, जिससे इसकी सुंदरता और बढ़ जाती है। साड़ियों का वजन भी उनके कपड़े और कढ़ाई की गहराई पर निर्भर करता है।

मोटिफ्स और पैटर्न्स

बनारसी साड़ियों में उपयोग किए जाने वाले डिज़ाइन और मोटिफ्स सालों में विकसित हुए हैं। पहले ये साड़ियां सिंपल टेक्सचर या धारियों के रूप में होती थीं, लेकिन धीरे-धीरे इनमें फूलों, पशुओं, पक्षियों के पैटर्न और मुगल शैली के डिज़ाइन जुड़े। 19वीं सदी के बाद इनमें भारतीय डिज़ाइनों के साथ विक्टोरियन शैली के ज्यामितीय डिज़ाइन भी नजर आने लगे।

असली बनारसी साड़ी की पहचान कैसे करें?

असली बनारसी साड़ी की पहचान करने के लिए साड़ी के उल्टे हिस्से में वॉर्प और वेफ्ट ग्रिड्स (ताने-बाने का जाल) की जांच करें। इसके अलावा, असली बनारसी साड़ियों में जरी का काम हमेशा सूक्ष्म होता है और डिज़ाइन में गहराई नजर आती है।

बनारसी साड़ी खरीदते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखें

फैब्रिक: कतान सिल्क जैसी बेहतरीन गुणवत्ता वाली बनारसी साड़ियां महंगी होती हैं। हल्की साड़ियों में कॉटन और लिनन का उपयोग किया जाता है, जबकि बनारस का खास कतान सिल्क सबसे अधिक फेमस है।

बुनाई: एक ही फैब्रिक में कढ़ाई की तकनीक पर भी कीमत निर्भर करती है। कढ़ाई में कढुवा तकनीक अधिक महंगी होती है क्योंकि इसमें डिज़ाइनों को बिना धागे के फंसे बनाए जाते हैं।

डिज़ाइन: जानवरों के मोटिफ्स वाली साड़ियां दुर्लभ होती हैं और उन्हें कुछ ही कारीगर बनाते हैं। इसके साथ ही नए डिज़ाइनों की कीमत ज्यादा होती है बनारसी साड़ियां एक कला का प्रतीक हैं, जिनमें शाही अंदाज़ और आकर्षण की झलक मिलती है। चाहे टंचोई हो, कढुवा, कटवर्क हो या मीना, बनारसी साड़ियों की चमक और खूबसूरती इन्हें पीढ़ियों तक चलने वाली धरोहर बनाती हैं।

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