भारत की केंद्रीय सरकार और प्रांतीय सरकारें जिस मुस्तैदी से कोरोना-युद्ध लड़ रही हैं, वह हमारे सारे दक्षिण एशिया के राष्ट्रों के लिए अनुकरणीय है। मुझे खुशी है कि अब हमारे सरकारी टीवी चैनलों ने शरीर की प्रतिरोध-शक्ति बढ़ाने वाले घरेलू नुस्खों का प्रचार शुरु कर दिया है। यह बात मैं तालाबंदी की घोषणा के पहले से लिख रहा हूं और टीवी चैनलों पर बोल रहा हूं। मेरे पारिवारिक सदस्यों और मुझे फोन करनेवाले सभी मित्रों से मैं कह रहा हूं कि आप काढ़ा बनाइए। उसमें अदरक, निंबू, तुलसी, हल्दी, दालचीनी, काली मिर्ची, गिलोय, नीम, जीरा शहद आदि डालकर खूब उबालिए। फिर घर के सभी सदस्यों और नौकरों-चाकरों को आधा-आधा कप पिला दीजिए। यह काढ़ा किसी भी संक्रामक जीवाणु से लड़ने में आपकी मदद करेगा। वह कोरोना हो या उसका बाप हो। इससे आपको किसी भी प्रकार की हानि तो हो ही नहीं सकती।

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने लिखा कि भारत की केंद्रीय सरकार और प्रांतीय सरकारें जिस मुस्तैदी से कोरोना-युद्ध लड़ रही हैं, वह हमारे सारे दक्षिण एशिया के राष्ट्रों के लिए अनुकरणीय है। मुझे खुशी है कि अब हमारे सरकारी टीवी चैनलों ने शरीर की प्रतिरोध-शक्ति बढ़ाने वाले घरेलू नुस्खों का प्रचार शुरु कर दिया है। यह बात मैं तालाबंदी की घोषणा के पहले से लिख रहा हूं और टीवी चैनलों पर बोल रहा हूं। मेरे पारिवारिक सदस्यों और मुझे फोन करनेवाले सभी मित्रों से मैं कह रहा हूं कि आप काढ़ा बनाइए। उसमें अदरक, निंबू, तुलसी, हल्दी, दालचीनी, काली मिर्ची, गिलोय, नीम, जीरा शहद आदि डालकर खूब उबालिए। फिर घर के सभी सदस्यों और नौकरों-चाकरों को आधा-आधा कप पिला दीजिए। यह काढ़ा किसी भी संक्रामक जीवाणु से लड़ने में आपकी मदद करेगा। वह कोरोना हो या उसका बाप हो। इससे आपको किसी भी प्रकार की हानि तो हो ही नहीं सकती।

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इसी आधार पर मेरा अंदाज है कि भारत में कोरोना उसी तरह नहीं फैल सकता, जैसा कि वह इटली, फ्रांस, अमेरिका और स्पेन में फैला है। इन देशों में पिछले पचास साल में कई बार जाकर मैं रहा हूं। इन देशों के खाने में हमारे मसालों का उपयोग नहीं के बराबर होता है। हमारे मसाले ही हमारी औषधि हैं। हमारे गांवों के गरीब और आदिवासी भी इन मसालों से भली-भांति परिचित हैं। इन्हें घरेलू नुस्खे कहा जाता है।

मुझे खुशी है कि केरल से कश्मीर तक सारी सरकारें बाहरी मजदूरों के खाने और रहने के इंतजाम में पूरी तरह जुटी हुई हैं। लेकिन इसके बावजूद वे हजारों की संख्या में अपने गांवों की तरफ भाग रहे हैं। वे सिर्फ खाने और सोने के लिए ही नहीं, अपने परिजनों के साथ यह डरावना समय बिताने के लिए भाग रहे हैं। इसीलिए मैंने कहा था कि सिर्फ तीन दिन के लिए इन लगभग पांच करोड़ प्रवासी मजदूरों को रेलों और बसों की सुविधा दे दी जाए। कुछ मुख्यमंत्रियों ने इस सुझाव पर अमल करना शुरु भी कर दिया था। अब ये लोग पुलिस के डर के मारे शहरों में ही टिके रहेंगे। पता नहीं, अब क्या होगा ? सरकार ने यह बड़ा जुआ खेल लिया है।

केंद्र सरकार ने यह अच्छी घोषणा कर दी कि यह तालाबंदी तीन महिने के लिए नहीं है। इसी डर के मारे लोग अपने गांवों की तरफ भाग रहे थे और सर्वत्र जमाखोरी शुरु हो गई थी। यदि हमें कोरोना को हराना है तो लोगों के दिल से डर को पहले हटाना है।