प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज (25 नवंबर) को लचित बरफुकन की 400वीं जयंती के उपलक्ष्य में वर्ष भर चलने वाले उत्सव के समापन समारोह में भाग लिया। लचित बरफुकन अहोम साम्राज्य की शाही सेना के सेनापति थे, जिन्होंने 1671 में सरायघाट की लड़ाई में मुगलों को बुरी तरह पराजित किया था।

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज (25 नवंबर) नई दिल्ली के विज्ञान भवन में लचित बरफुकन की 400वीं जयंती के उपलक्ष्य में वर्ष भर चलने वाले उत्सव के समापन समारोह में भाग लिया। इस मौके पर असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा, राज्यपाल जगदीश मुखी, केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल और अन्य नेता मौजूद रहे। यह प्रधानमंत्री का गुमनाम नायकों को उचित तरीके से सम्मानित करने का निरंतर प्रयास रहा है। इसी भावना के अनुरूप देश वर्ष 2022 को लचित बरफुकन की 400वीं जयंती वर्ष के रूप में मना रहा है। इस उत्सव का उद्घाटन इस वर्ष फरवरी में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा गुवाहाटी में किया गया था। (पहली तस्वीर-विज्ञान भवन, नई दिल्ली में शुक्रवार, 25 नवंबर, को लचित बरफुकन की 400वीं जयंती के साल भर चलने वाले समारोह के समापन समारोह के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को एक स्मृति चिन्ह भेंट किया गया)

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( तस्वीर-विज्ञान भवन, नई दिल्ली में शुक्रवार, 25 नवंबर को लचित बरफुकन की 400वीं जयंती के साल भर चलने वाले समारोह के समापन समारोह के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी)

असम की धरती को प्रणाम करता हूं
मोदी ने कहा-सबसे पहले मैं असम की उस महान धरती को प्रणाम करता हूं, जिसने मां भारती को लचित जैसे वीर दिए हैं। ये मेरा सौभाग्य है कि मुझे इस कार्यक्रम से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ। मैं इस अवसर पर असम की जनता और समस्त देशवासियों को बधाई और शुभकामनाएं देता हूं। आज भारत अपनी संस्कृति के ऐतिहासिक नायक-नायिकाओं को गर्व से याद कर रहा है। लचित जैसी मां भारती की अमर संतानें हमारी अविरल प्रेरणा हैं। मैं इस पुण्य अवसर पर लचित को नमन करता हूं।

आज देश ने औपनिवेशिक मानसिकता को त्याग दिया है और अपनी विरासत के लिए गर्व से भर गया है। भारत न केवल सांस्कृतिक विविधता का जश्न मना रहा है, बल्कि इतिहास के नायकों को भी गर्व के साथ याद कर रहा है। अगर कोई तलवार के जोर से हमें झुकाना चाहता है, हमारी शाश्वत पहचान को बदलना चाहता है, तो हमें उसका जवाब भी देना आता है। असम और पूर्वोत्तर की धरती इसकी गवाह रही है। वीर लचित ने जो वीरता और साहस दिखाया वो मातृभूमि के लिए अगाध प्रेम की पराकाष्ठा थी। 

बोरफुकन जैसे वीरों ने अत्याचारियों से मुक्ति दिलाई
असम के लोगों ने आक्रमणकारियों का सामना किया और उन्हें कई बार हराया। मुगलों ने गुवाहाटी पर अधिकार कर लिया, लेकिन लचित बोरफुकन जैसे वीरों ने इसे अत्याचारियों से मुक्त करा लिया। सराईघाट में लचित बोरफुकन द्वारा दिखाई गई बहादुरी मातृभूमि के प्रति उनके गहरे प्रेम को दर्शाती है। लचित बोरफुकन की वीरता और उनकी निडरता असम की पहचान है। आजादी के बाद भी हमें वही इतिहास पढ़ाया गया, जिसको गुलामी के कालखंड में साजिशन रचा गया। आजादी के बाद आवश्यकता थी कि गुलामी के एजेंडे को बदला जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत का इतिहास सिर्फ गुलामी का इतिहास नहीं है, ये योद्धाओं का इतिहास है... भारत का इतिहास जय का है, वीरता का है, बलिदान का है, महान परंपरा का है। असम के लोगों ने आक्रमणकारियों का सामना किया और उन्हें कई बार हराया। मुगलों ने गुवाहाटी पर अधिकार कर लिया, लेकिन लचित बोरफुकन जैसे वीरों ने इसे अत्याचारियों से मुक्त करा लिया। सराईघाट में लचित बोरफुकन द्वारा दिखाई गई बहादुरी मातृभूमि के प्रति उनके गहरे प्रेम को दर्शाती है। लचित बोरफुकन की वीरता और उनकी निडरता असम की पहचान है। आजादी के बाद भी हमें वही इतिहास पढ़ाया गया, जिसको गुलामी के कालखंड में साजिशन रचा गया। आजादी के बाद आवश्यकता थी कि गुलामी के एजेंडे को बदला जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत का इतिहास सिर्फ गुलामी का इतिहास नहीं है, ये योद्धाओं का इतिहास है... भारत का इतिहास जय का है, वीरता का है, बलिदान का है, महान परंपरा का है। 

क्या लचित का शौर्य मायने नहीं रखता क्या
उनका जीवन प्रेरणा देता है कि हम परिवारवाद से ऊपर उठ देश के बारे में सोचें। उन्होंने कहा था कि कोई भी रिश्ता देश से बड़ा नहीं होता। आज का भारत 'राष्ट्र प्रथम' के आदर्श को लेकर आगे बढ़ रहा है। हमारी ये जिम्मेदारी है कि हम अपनी इतिहास की दृष्टि को केवल कुछ दशकों तक सीमित ना रखें। क्या लचित का शौर्य मायने नहीं रखता क्या? इतिहास को लेकर, पहले जो गलतियां हुई... अब देश उनको सुधार रहा है। यहां दिल्ली में हो रहा ये कार्यक्रम इसका प्रतिबिम्ब है। लचित का जीवन हमें प्रेरणा देता है कि हम व्यक्तिगत स्वार्थों को नहीं देश हित को प्राथमिकता दें। भारत का इतिहास विजय, वीरों, शौर्य और महान संस्कृति का इतिहास है। हमें भारत को विकसित और पूर्वोत्तर को भारत के सामर्थ का केंद्र बिंदु बनाना है। मुझे विश्वास है कि वीर लचित की जन्म जयंती हमारे इन संकल्पों को मजबूत करेगी और देश अपने लक्ष्यों को प्राप्त करेगा। कुछ दिनों पहले असम सरकार ने लाचित बोरफुकन की याद में एक संग्रहालय बनाने की घोषणा की थी। इसके अलावा, वे असम के नायकों के सम्मान में एक स्मारक बनाने की योजना बना रहे हैं। ये प्रयास आने वाली पीढ़ियों को हमारे इतिहास और नायकों को समझने में मदद करेंगे।

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जानिए कौन हैं लचित बरफुकन?
लचित बरफुकन (जन्म-24 नवंबर, 1622, मृत्यु- 25 अप्रैल, 1672) असम के अहोम साम्राज्य की शाही सेना के प्रसिद्ध सेनापति थे, जिन्होंने मुगलों को हराकर औरंगजेब के अधीन मुगलों की लगातार बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को सफलतापूर्वक रोक दिया था। लचित बरफुकन ने 1671 में लड़ी गई सरायघाट की लड़ाई में असमिया सैनिकों को प्रेरित किया और मुगलों को एक करारीव अपमानजनक हार स्वीकार करने को बाध्य किया। लचित बरफुकन और उनकी सेना की वीरतापूर्ण लड़ाई हमारे देश के इतिहास में प्रतिरोध की सबसे प्रेरक सैन्य उपलब्धियों में से एक है।

इससे पहले पीएम मोदी ने लचित दिवस के अवसर पर लोगों को बधाई दी। मोदी ने एक ट्वीट में कहा-"लचित दिवस की बधाई। ये लचित दिवस विशेष है, क्योंकि हम महान लचित बोड़फुकन की 400वीं जयंती मना रहे हैं। वे अद्वितीय साहस के प्रतीक थे। उन्होंने लोगों की भलाई को सबसे ऊपर रखा और वे एक न्यायप्रिय और दूरदर्शी लीडर थे।"

यह भी जानिए
इससे पहले मोदी ने जुलाई 2022 में पीएम ने आंध्र प्रदेश के भीमावरम में महान स्वतंत्रता सेनानी अल्लूरी सीताराम राजू की 125वीं जयंती समारोह का शुभारंभ किया था। जून 2022 में पीएम ने मुंबई के राजभवन में बने ब्रिटिश काल के अंडरग्राउंड बंकर में बनाई गई गैलरी 'क्रांति गाथा' का उद्घाटन किया था। गैलरी में वासुदेव बलवंत फड़के, चाफेकर बंधु, बाल गंगाधर तिलक, वीर सावरकर, बाबाराव सावरकर, क्रांतिगुरु लहूजी साल्वे, अनंत लक्ष्मण कान्हेरे, राजगुरु, मैडम भीकाजी कामा सहित अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरों को रखा गया है। 

नरेंद्र मोदी ने नवंबर 2021 में रांची में भगवान बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान सह स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय का उद्घाटन किया था। फरवरी 2021 में पीएम ने उत्तर प्रदेश के बहराइच में महाराजा सुहेलदेव स्मारक की आधारशिला रखी। वहीं, फरवरी 2019 में पीएम ने पानीपत की लड़ाइयों के नायकों को सम्मानित करने के लिए 'बैटल्स ऑफ पानीपत म्यूजियम', पानीपत की आधारशिला रखी थी।

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