बीमारी हो या जंग, इसमें जीत हमारे हौसलों पर निर्भर करती है। दोनों स्थितियों से विजेता बनकर निकलने के लिए आपको खुद को मजबूत करना होगा। लेकिन घबराहट और डर कई बार भारी पड़ने लगती है। हम आपके इसी डर से उबारने के लिए कोरोना विनर्स की कहानियों की श्रृंखला लाए हैं।

लखनऊ। कोरोना की दूसरी लहर ने तांडव खत्म कर दिया है। अवसाद और शोक में डूबा समाज धीरे-धीरे खुद को इन सबसे उबारने की कोशिश में है। हालांकि, अब तीसरी लहर की आशंकाओं के बीच वायरस के डेल्टा वेरिएंट ने दहशत पैदा करना शुरू कर दिया है। कोरोना ने ढेर सारी जिंदगियां छीन ली हैं लेकिन उससे अधिक ऐसे हैं जो कोरोना को जज्बे-संयम और सतर्कता से मात दी है। ऐसे लोग और उनकी आपबीती हमको संबल देती है, भविष्य में हमको ऐसे अदृश्य दुश्मन के वार से बचाने में सहायक होती हैं। उत्तराखंड में पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ पत्रकार स्कंद शुक्ल भी उन जंगबाजों में एक हैं जिन्होंने अदृश्य दुश्मन को मात दिया है। 

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AsianetNews Hindi के धीरेंद्र विक्रमादित्य गोपाल ने यूपी के बस्ती के रहने वाले स्कंद शुक्ल से बात की है। कोरोना की जंग जीतने वाले स्कंद ने संकट के उन दिनों पर विस्तार से बात की है। बताया है कि कैसे परिवार और अपनों की मदद और हौसले के बल पर उन्होंने खुद को इस लड़ाई से निकाला। 

पिताजी बीमार पड़े तो अस्पताल आना जाना हुआ और एक दिन मैं भी बीमार पड़ गया

हल्द्वानी में था। कोरोना पीक पर था। भइया ने फोन पर बताया कि पिताजी की तबीयत ठीक नहीं है। कोविड-19 पाॅजिटिव सुनकर रहा नहीं गया भागा घर आ गया। यहां पहुंचा तो अस्पताल में भागदौड़ लगी रही। पिताजी ठीक हुए तो भईया पाॅजिटिव हो गए। अप्रैल 20-22 की बात होगी मुझे फीवर हुआ। दवा खाई। एक दिन-दो दिन-तीन दिन। बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले। इसी बीच अचानक से खांसी बढ़ गई। 

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दिन में एक आधा घंटा को छोड़कर पूरे दिन खांसता रहता

बेतहाशा खांसना शुरू हो गया। खांसी इतनी की बंद होने का नाम ही नहीं ले। खांसी की वजह से नींद नहीं। आक्सीजन लेवल भी गिरने लगा। एंटीजन टेस्ट कराया वह नेगेटिव आ गया। हालांकि, सारे लक्षण कोविड-19 के थे। जिले में एक ही अस्पताल, वह भी बिना आरटीपीसीआर के भर्ती नहीं करता। शहर के हालात बिगड़े हुए थे। हर ओर हाहाकार मचा हुआ था। पूरा परिवार परेशान हो उठा। आक्सीजन लेवल कम होने पर घर के सदस्यों की और घबराहट बढ़ने लगी।

घर के लोगों ने मुंहमांगी कीमत पर आक्सीजन तय किया लेकिन...

मेरा आक्सीजन लेवल 74-75 तक आ जा रहा था। कहीं अस्पताल नहीं, डाॅक्टर जो देख रहे थे वह डर और बढ़ा रहे थे। मेरी हालत खराब होती जा रही थी। दवा भी राहत देने की बजाय परेशानी बढ़ा रही थी। भईया और मेरे एक रिश्तेदार ने आक्सीजन ब्लैक कर रहे एक व्यक्ति से बात की। वह रात में 20 हजार रुपये में सिलेंडर देने पर राजी हुआ। घर वाले बिना सोचे हां कर दिए। कई घंटे का इंतजार लेकिन वह व्यक्ति नहीं आया। फिर फोन किया कि 20 हजार नहीं 50 हजार में एक आक्सीजन सिलेंडर दे सकता है। भईया ने फिर से तुरंत हां बोल दिया। लेकिन रात भर इंतजार होता रहा और वह नहीं आया। हालांकि, सांस की दिक्कत महसूस होते ही तुरंत पेट के बल लेटकर किसी तरह आत्मशक्ति से मन में कहीं से भी डर नहीं आने देता।

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फिर मिले डाॅ.सुधाकर पांडेय

हालत मेरी खराब होती जा रही थी। जो डाॅक्टर इलाज कर रहे थे उनकी दवा एक परसेंट भी काम नहीं कर रही थी। कमजोरी इतनी एक कदम चलना भी मुश्किल हो रहा था। संयोग अच्छा था कि घर के लोग डाॅ.सुधाकर पांडेय के पास ले गए। उन्होंने मन से कोविड का डर निकाला। दवाइयां दी। रोज सुबह-शाम इंजेक्शन आठ दिनों तक लगाया। डिप लगातार चढ़ता रहा। फिर धीरे-धीरे रिकवर होना शुरू किया। मेरी हालत खराब थी लेकिन डाॅक्टर पांडेय ने कभी मन में यह बात ही नहीं आने दी कि मेरी हालत खराब है। हालांकि, मन ही मन वह सशंकित रहते थे लेकिन मुझे अहसास नहीं होने दिया। 

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खानपान का भी रखा परिवार वालों ने पूरा ख्याल

हालांकि, भूख तो उन दिनों बहुत कम लगती थी लेकिन खाना कभी छोड़ा नहीं। दाल, हरी सब्जियां, फल को खाने में शामिल किया। टाइम-टू-टाइम थोड़ा-थोड़ा खाता रहा ताकि एनर्जी लेवल भी मेंटेन रहे। कमजोरी बहुत हो गई थी। रिकवर होने के बाद भी खाने पर विशेष ध्यान दे रहा। डाॅक्टर के किसी सलाह को नजरअंदाज नहीं कर रहा। 

घर का सपोर्ट इन हालातों में रेमेडी का काम करती

कोरोना जैसी बीमारियां शरीर को ही नहीं मानसिक रूप से भी आपको कमजोर करती हैं। घर का इसमें सबसे बड़ा रोल होता है। मैं बीमार पड़ा तो घर पर था, यही मेरे बचने की सबसे बड़ी वजह थी। पूरा परिवार दिन रात एक कर दिया था मेरे लिए। मेरी छोटी से छोटी जरूरतों को वह समझ जाते थे। इन सब हालात में परिवार का भावनात्मक रूप से जुड़ा होना सबसे बड़ा संबल होता है। मैं समझता हूं कि मेरे लिए सबसे अच्छी बात यही थी कि मेरे पास घर के सारे लोग थे। जो मेरी देखभाल तो कर ही रहे थे मानसिक रूप से भी मुझे टूटने नहीं दिए। 

कभी भी नकारात्मक बातें मन में नहीं लाने दें

खुद ऐसे पेशे से जुड़ा हूं कि बीमारी की भयावहता या कोई और बात मुझसे छिप नहीं सकती। लेकिन एक बात मन में ठान ली थी कि घर पर ही ठीक होउंगा। अस्पताल की स्थितियों के बारे में सबकुछ पता ही था। जब आक्सीजन लेवल कम होने लगा तब भी मन को शांत रखकर भय निकालने की कोशिश करता था। परिवार के लोग पूरा सहयोग करते। इन सब हालातों में घबराने की बजाय खुद में आत्मविश्वास जगाए रखना चाहिए और सही डाॅक्टर से इलाज पर जोर देना चाहिए। 

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