इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगने वाली छात्रा की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्कूल के ड्रेस कोड, अनुशासन और समानता के पहलुओं पर जोर दिया। जानिए क्या था पूरा मामला और कोर्ट ने क्या कहा।
स्कूल की यूनिफॉर्म सिर्फ कपड़ों का नियम है या इसके पीछे समानता और अनुशासन की भी एक बड़ी सोच है? प्रयागराज से सामने आए हिजाब विवाद ने इसी सवाल को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक नाबालिग छात्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि छात्रा अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त कानूनी और तथ्यात्मक आधार पेश नहीं कर सकी।
क्या था पूरा मामला?
मामला प्रयागराज के एक निजी, CBSE से संबद्ध स्कूल का है। कक्षा 11 में प्रवेश लेने वाली छात्रा ने स्कूल यूनिफॉर्म के साथ सिर पर स्कार्फ पहनने की अनुमति मांगी थी। उसका कहना था कि वह पहले कक्षा 6 से 10 तक इसी तरह स्कूल आती रही थी। हालांकि, अदालत के सामने यह स्थापित नहीं हो सका कि हिजाब पहनना इस मामले में ऐसा अनिवार्य धार्मिक अधिकार है, जिसके आधार पर निर्धारित यूनिफॉर्म में बदलाव की मांग की जा सके।
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने 21 अगस्त 2026 के फैसले में याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने संस्थागत अनुशासन और निर्धारित ड्रेस कोड को भी महत्वपूर्ण माना।
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कोर्ट ने हिजाब और यूनिफॉर्म पर क्या कहा?
फैसले का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने व्यक्तिगत धार्मिक आस्था और स्कूल के संस्थागत नियमों के बीच अंतर पर जोर दिया। कोर्ट के अनुसार, यूनिफॉर्म का उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच समानता और अनुशासन बनाए रखना है। किसी छात्र को अपनी व्यक्तिगत पसंद के आधार पर यूनिफॉर्म में बदलाव की अनुमति देने से संस्थान की ड्रेस कोड व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि अदालत का फैसला सभी परिस्थितियों में हिजाब पहनने पर रोक का सामान्य आदेश नहीं है। विवाद स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म और उसके साथ अतिरिक्त परिधान पहनने की मांग से जुड़ा था।
पहले भी आ चुका है हिजाब पर बड़ा फैसला
हिजाब और स्कूल ड्रेस को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट की 2022 की पूर्ण पीठ का फैसला भी महत्वपूर्ण रहा है। उस मामले में अदालत ने कहा था कि हिजाब को इस्लाम की ‘essential religious practice’ साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं रखी गई और निर्धारित यूनिफॉर्म को संवैधानिक रूप से उचित प्रतिबंध माना था। हालांकि, उसी कर्नाटक मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ का फैसला अलग-अलग राय के साथ सामने आया था, इसलिए हिजाब विवाद को केवल एक पुराने हाईकोर्ट फैसले के आधार पर पूरी तरह तय मानना सही नहीं होगा।
फैसला क्यों है चर्चा में?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला एक बार फिर यह बहस सामने लाता है कि शिक्षण संस्थानों में व्यक्तिगत धार्मिक अभिव्यक्ति और समान यूनिफॉर्म के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अदालत ने इस मामले में स्कूल के ड्रेस कोड और संस्थागत अनुशासन को प्राथमिकता दी है। इस फैसले को धार्मिक आस्था पर सामान्य टिप्पणी के बजाय उसी मामले के तथ्यों और स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के संदर्भ में देखना अधिक उचित होगा।
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