बांग्लादेश की करीब 690 गारमेंट फैक्ट्रियों में उत्पादन ठप होने की खबर से ग्लोबल कपड़ा कारोबार में हलचल है। क्या अमेरिका और यूरोप के बड़े ब्रांड अब भारत का रुख करेंगे? तिरुपुर, नोएडा, सूरत, लुधियाना और बेंगलुरु के लिए कितना बड़ा है यह मौका?
बांग्लादेश की कपड़ा फैक्ट्रियों में मजदूरों का गुस्सा अब भारत के लिए कारोबार का बड़ा मौका बन सकता है। जिस देश ने सालों तक अमेरिका और यूरोप के बड़े फैशन ब्रांडों के कपड़े बनाकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत किया, वहां अब मजदूर सड़कों पर हैं और फैक्ट्रियों में उत्पादन ठप हो रहा है। 2 नवंबर को करीब 679 से 690 फैक्ट्रियों में काम रुकने की खबर सामने आई। ऐसे में विदेशी खरीदारों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि समय पर कपड़ों की सप्लाई कहां से मिलेगी? भारत के तिरुपुर, नोएडा, सूरत और लुधियाना जैसे औद्योगिक शहर इस मौके को भुना सकते हैं।
बांग्लादेश में क्यों बंद हो रहीं कपड़ा फैक्ट्रियां?
बांग्लादेश में गारमेंट सेक्टर के मजदूर न्यूनतम वेतन 12,500 टका से बढ़ाकर 30,000 टका करने की मांग कर रहे हैं। विरोध प्रदर्शनों के कारण सैकड़ों फैक्ट्रियों में उत्पादन प्रभावित हुआ है। इसके अलावा महंगी बिजली-गैस, बैंक ब्याज, ऑर्डर की कमी और राजनीतिक अस्थिरता ने भी उद्योग की मुश्किलें बढ़ाई हैं। पिछले तीन साल में 402 से ज्यादा फैक्ट्रियां बंद होने की जानकारी सामने आई है।
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तिरुपुर और नोएडा को मिल सकता है सबसे बड़ा फायदा
तमिलनाडु का तिरुपुर भारत का प्रमुख टी-शर्ट और निटवेयर हब है। यहां धागे से लेकर रंगाई, सिलाई और पैकिंग तक का पूरा नेटवर्क मौजूद है। 2025-26 में जिले का टेक्सटाइल, रेडीमेड गारमेंट और हस्तशिल्प का संयुक्त निर्यात 38,677 करोड़ रुपये रहा। वहीं नोएडा में अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों के लिए कपड़े बनाने वाली फैक्ट्रियां मौजूद हैं। गौतम बुद्ध नगर का इसी श्रेणी में संयुक्त निर्यात 21,095 करोड़ रुपये रहा। बांग्लादेश से ऑर्डर शिफ्ट होते हैं तो दोनों शहरों को नए विदेशी ग्राहक मिल सकते हैं।
सूरत, लुधियाना और बेंगलुरु भी दौड़ में
सूरत सिंथेटिक और पॉलिएस्टर फैब्रिक बनाने में मजबूत है। लुधियाना होजरी, स्वेटर और ट्रैकसूट के लिए जाना जाता है। वहीं बेंगलुरु में महिलाओं के कपड़ों से लेकर फैशन गारमेंट तक का बड़ा कारोबार है। 2025-26 में बेंगलुरु अर्बन का संबंधित संयुक्त निर्यात 16,205 करोड़ रुपये रहा। ऐसे में विदेशी कंपनियों के लिए ये शहर भी विकल्प बन सकते हैं।
भारत को कच्चे माल के कारोबार में हो सकता है नुकसान
इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। भारत बांग्लादेश को बड़ी मात्रा में कपास, धागा और कपड़ा सप्लाई करता है। वहां उत्पादन घटने से भारतीय कच्चे माल के निर्यातकों के ऑर्डर प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, अगर तैयार कपड़ों का उत्पादन भारत में बढ़ता है तो घरेलू स्तर पर कपास और धागे की मांग बढ़ने की संभावना है।
अमेरिका-यूरोप के ऑर्डर हासिल करना आसान नहीं
भारत के अपैरल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी करीब 30.52 फीसदी और यूरोपीय संघ की 29.47 फीसदी बताई गई है। यही बाजार भारतीय कंपनियों के लिए सबसे बड़ा अवसर बन सकते हैं। लेकिन विदेशी ब्रांड केवल बांग्लादेश की परेशानी देखकर भारत को ऑर्डर नहीं देंगे। कीमत, गुणवत्ता और समय पर डिलीवरी सबसे अहम होंगे। अगर भारतीय कंपनियां इन तीन मोर्चों पर खरी उतरती हैं, तो बांग्लादेश की मुश्किल भारत के टेक्सटाइल उद्योग के लिए बड़ा मौका बन सकती है।
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