नेपाल चुनाव में बालेंद्र शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने प्रचंड बहुमत जीता है। बेंगलुरु से पढ़े शाह प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं। RSP ने 94 में से 70 सीटें जीतीं, जबकि प्रमुख पुरानी पार्टियां 6-6 सीटों पर सिमट गईं।

काठमांडू: नेपाल में हुए आम चुनाव के नतीजे आ गए हैं और बेंगलुरु से पढ़े बालेंद्र शाह प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं। सोमवार को आए नतीजों में उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) ने प्रचंड बहुमत हासिल किया है। के.पी. ओली शर्मा सरकार गिरने के बाद 5 मार्च को चुनाव हुए थे। कुल 94 सीटों में से RSP ने 70 सीटों पर जीत का परचम लहराया है। वहीं, नेपाली कांग्रेस, CPN-UML और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टियों को सिर्फ 6-6 सीटें ही मिलीं।

बालेंद्र शाह इससे पहले काठमांडू शहर के मेयर थे। राजनीति में आने से पहले वह 'बालेन' नाम से एक रैपर के तौर पर मशहूर थे। इस चुनाव में उन्होंने 4 बार प्रधानमंत्री रह चुके के.पी. शर्मा ओली को 4842 वोटों के अंतर से हराया है। शाह ने कर्नाटक के बेलगावी में मौजूद VTU (विश्वेश्वरैया टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी) से जुड़े निट्टे कॉलेज से एम.टेक किया है। उन्होंने 2016 से 2018 के बीच बेलगावी की VTU के तहत आने वाले निट्टे मीनाक्षी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NMIT) से स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग में मास्टर ऑफ टेक्नोलॉजी (M.Tech) की डिग्री पूरी की थी।

RSP पार्टी की स्थापना सिर्फ चार साल पहले पूर्व पत्रकार रबी लामिछाने ने की थी। वहीं, पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली की पार्टी CPN-UML अब तक कुछ ही सीटें जीत पाई है। पिछले साल सितंबर में हुई हिंसक झड़पों के बाद, 5 मार्च को हुए चुनाव में 58% वोटिंग हुई थी। चुनाव आयोग ने बताया है कि वोटों की गिनती 9 मार्च तक पूरी करने की कोशिश की जाएगी, जिसमें तीन से चार दिन लग सकते हैं।

नेपाल में सांसदों को चुनने के दो तरीके

नेपाल का चुनावी सिस्टम मिला-जुला है, यानी यहां सांसदों को दो तरीकों से चुना जाता है: डायरेक्ट इलेक्शन और पार्टी को मिले कुल वोटों के आधार पर।

डायरेक्ट इलेक्शन (सीधा चुनाव)

संसद की 275 में से 165 सीटें सीधे चुनाव से भरी जाती हैं। हर सीट पर लोग अपने उम्मीदवार को वोट देते हैं और सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीत जाता है। यह कुछ-कुछ भारत के लोकसभा चुनाव जैसा ही है।

वोट प्रतिशत के आधार पर सीटें

बाकी 110 सीटें पार्टियों को मिले वोटों के प्रतिशत के आधार पर दी जाती हैं। इसमें वोटर उम्मीदवार को नहीं, बल्कि पार्टी को वोट देते हैं। पार्टी को देश भर में जितने प्रतिशत वोट मिलते हैं, उसी अनुपात में उसे संसद में सीटें मिलती हैं। इस सिस्टम का मकसद यह है कि छोटी पार्टियों और अलग-अलग सामाजिक समूहों को भी संसद में जगह मिल सके और कोई एक पार्टी पूरी तरह से हावी न हो।

RSP की बंपर जीत के पीछे क्या वजह है?

नेपाल के मिले-जुले चुनावी सिस्टम की वजह से, आमतौर पर किसी एक पार्टी के लिए पूर्ण बहुमत लाना मुश्किल माना जाता था। लेकिन RSP लगभग दो-तिहाई सीटें जीतती दिख रही है। संविधान लागू होने के बाद यह पहली बार है कि किसी एक पार्टी ने इतनी सीटें जीती हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि काठमांडू के मेयर के तौर पर बालेन शाह की साफ-सुथरी छवि इस जीत की एक बड़ी वजह है।

राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर लोक राज बराल ने कहा कि गगन थापा के नेतृत्व में नेपाली कांग्रेस ने अपनी पुरानी छवि से बाहर आने की कोशिश की, लेकिन कम समय मिलने के कारण वे पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाए। बराल के मुताबिक, RSP के पक्ष में यह लहर इसलिए उठी क्योंकि लोग पुरानी पार्टियों से नाराज और निराश थे। पिछली सरकारें लोगों को बुनियादी सुविधाएं देने में नाकाम रही थीं और बालेन शाह की लोकप्रियता ने इस लहर को और मजबूत कर दिया। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अगर सत्ता में आने के बाद प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो ऐसी लहरें टिकती नहीं हैं।