क्या OSM की तारीफ़ वाले वीडियो भरोसा बढ़ा रहे हैं या किसी बड़े नैरेटिव को छिपा रहे हैं? क्या CBSE का डिजिटल मूल्यांकन समय से पहले लागू कर दिया गया? तकनीक फेल हुई या भरोसा? OSM विवाद में असली लड़ाई अंकों की नहीं, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और लाखों छात्रों के भविष्य से है। 

नई दिल्ली: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) का नया डिजिटल मूल्यांकन सिस्टम यानी ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) इस समय देश के लाखों छात्रों और उनके अभिभावकों के लिए एक बड़ा मानसिक तनाव बन चुका है। आंसर-शीट के पन्ने गायब होने, अंकों की गंभीर गड़बड़ियों और स्कैनिंग में खामियों को लेकर जहाँ एक तरफ चौतरफा चीख-पुकार मची है, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर अचानक एक बिल्कुल उलट नजारा दिखने लगा है। देश के रसूखदार स्कूलों के प्रिंसिपलों के वीडियो अचानक सामने आने लगे हैं, जो इस सिस्टम को एक "क्रांतिकारी सुधार" बताकर इसकी तारीफों के पुल बांध रहे हैं। इस अजीब विरोधाभास ने अब एक नया और गहरा सस्पेंस पैदा कर दिया है कि आखिर इस संकट के बीच कामयाबी की यह झूठी कहानी कौन और क्यों गढ़ रहा है?

Add Asianetnews Hindi as a Preferred SourcegooglePreferred

पर्दे के पीछे का खेल: किसे मिल रहा है 'सफलता की कहानी' का मुनाफा?

जब 12वीं क्लास के नतीजे आने के बाद छात्र और उनके माता-पिता दोबारा मूल्यांकन (Re-evaluation) के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे थे, तब इस डिजिटल सिस्टम की ब्रांडिंग करने की जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? इस 'नैरेटिव कंट्रोल' के खेल से जुड़े पर्दे के पीछे के कुछ चौंकाने वाले पहलू इस प्रकार हैं:

  • CBSE का सुरक्षा कवच: बोर्ड के लिए किसी भी ऐसे सुधार का बचाव करना बेहद आसान हो जाता है जिसे जनता के बीच 'सफल' प्रचारित कर दिया जाए। इससे व्यवस्था की जवाबदेही खत्म हो जाती है।
  • लगा दांव पर स्कूलों की साख: स्कूलों ने इस सिस्टम को अपनाने में अपना समय, संसाधन और प्रतिष्ठा दांव पर लगा रखी है, इसलिए वे अपनी नाकामी छुपाने के लिए इसका समर्थन कर रहे हैं।
  • हैदराबाद की टेक कंपनी का जैकपॉट: इस पूरे प्रोजेक्ट का टेंडर हैदराबाद की कंपनी 'Coempt Eduteck' को थाली में सजाकर सौंप दिया गया था। सिस्टम की तारीफ होने से कंपनी पर जमीनी खामियों को लेकर उठ रहे उंगलियों के सवाल दब जाते हैं।

Scroll to load tweet…

खौफनाक सच: 2026 से पहले लागू ही नहीं होना था यह सिस्टम!

इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा और सनसनीखेज खुलासा मुंबई और ओडिशा के सीनियर प्रिंसिपलों और शिक्षाविदों के बयानों से हुआ है। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, कोविड काल के दौरान जब 9वीं क्लास के लिए इस सिस्टम का ट्रायल किया गया था, तो यह तकनीकी दिक्कतों (Glitches) के कारण बुरी तरह फेल हो गया था और बोर्ड ने इस विचार को ठंडे बस्ते में डाल दिया था।

ओडिशा (भुवनेश्वर) की एक सीनियर प्रिंसिपल ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "12वीं क्लास के लिए OSM को साल 2026 से पहले लागू करने की कोई योजना ही नहीं थी।" बोर्ड ने बिना किसी पर्याप्त तैयारी और शिक्षकों को उचित ट्रेनिंग दिए बिना, इस बेहद संवेदनशील परीक्षा चक्र पर इसे जबरन थोप दिया।

सर्वर डाउन और कॉपियां गायब: दबाव में घुटती परीक्षा प्रणाली

डीएवी (DAV) स्कूल के एक शिक्षक ने नतीजे घोषित होने से पहले ही आगाह किया था कि इस साल का रिजल्ट एक बड़े तकनीकी दलदल में फंसने वाला है। मूल्यांकन के दौरान शिक्षकों को रोजाना इन भयानक अनुभवों से गुजरना पड़ा:

  • लॉगिन और मुख्य सर्वर का बार-बार क्रैश होना।
  • स्कैन की गई कॉपियों का स्क्रीन पर लोड होने में घंटों का वक्त लेना।
  • जांच के दौरान अचानक सॉफ्टवेयर का बंद हो जाना और मूल्यांकनकर्ताओं के काम में रुकावट आना।

छात्रों का दर्द: "हमारे नतीजे राजनीतिक हथियार बन गए हैं"

दिल्ली के 12वीं क्लास के पीड़ित छात्र स्वयं मोहंती का कहना है कि उन्हें नहीं पता कि स्कूलों को कोई 'नैरेटिव टूलकिट' बांटी गई है या नहीं, लेकिन उनके सवाल अनसुने हैं और उनके करियर के नतीजे अब एक राजनीतिक हथियार बन चुके हैं। अभिभावकों का मानना है कि प्रिंसिपलों द्वारा वीडियो बनाकर किया जा रहा यह प्रचार एक घटिया पीआर (PR) हथकंडा है।

करियर, दाखिले और स्कॉलरशिप के इस बेहद नाजुक मोड़ पर, यह लड़ाई अब सिर्फ तकनीकी खामियों की नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की सबसे बड़ी परीक्षा संस्था और जनता के बीच पैदा हुए 'भरोसे के अंतर' (Trust Deficit) की बन चुकी है। क्या सीबीएसई अपनी गलतियों को सुधारेगा, या फिर इस डिजिटल प्रोपेगैंडा के पीछे छात्रों का भविष्य ऐसे ही दांव पर लगा रहेगा? ये सवाल अब भी अनुत्तरित है।