CEC Act Section 18 क्या है? चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में ज्ञानेश कुमार और SIR विवाद पर इस कानून का हवाला क्यों दिया? जानिए सर्वसम्मति, बहुमत और चुनाव आयोग के फैसले लेने की प्रक्रिया से जुड़े अहम प्रावधान।

Supreme Court Hearing: सुप्रीम कोर्ट में इस समय चुनाव आयोग (ECI) की कार्यप्रणाली को लेकर कानूनी जंग छिड़ी हुई है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाने या काम करने से रोकने की मांग वाली याचिकाओं के जवाब में ECI ने 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023' की धारा 18 का हवाला दिया है। आयोग का साफ कहना है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े सभी फैसले एकतरफा नहीं, बल्कि सामूहिक और सर्वसम्मति से लिए गए थे। यह पूरा विवाद चुनाव आयोग के अंदरूनी फैसलों और कमिशनर्स के बीच मतभेदों को लेकर गरमाया हुआ है। आइए जानते हैं क्या है यह धारा और क्यों यह सुप्रीम कोर्ट में इतनी अहम बन गई है।

CEC एक्ट की धारा 18 क्या है और क्यों चर्चा में है?

  • कामकाज का निपटारा: 2023 के इस कानून की धारा 18 का शीर्षक 'डिस्पोजल ऑफ बिजनेस' (कामकाज का निपटारा) है, जो तय करती है कि चुनाव आयोग अपने फैसले कैसे लेगा।
  • सर्वसम्मति को प्राथमिकता: धारा 18(2) के मुताबिक, आयोग के सभी फैसले जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होने चाहिए। यदि सदस्यों में मतभेद हो, तो फैसला बहुमत के आधार पर लिया जाएगा।
  • काम का बंटवारा: धारा 18(1) कहती है कि आपसी सहमति से ही सदस्यों के बीच कामकाज की प्रक्रिया और जिम्मेदारियां बांटी जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग का क्या है मुख्य तर्क?

  • एकतरफा फैसलों से इनकार: ECI ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में उन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि CEC ने अकेले सारे फैसले लिए।
  • तीन बड़े आदेश: आयोग ने स्पष्ट किया कि 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी किए गए SIR (मतदाता पुनरीक्षण) से जुड़े सभी आदेश सर्वसम्मति से ही पारित हुए थे।
  • आंतरिक टिप्पणियां फैसला नहीं: ECI का कहना है कि विचार-विमर्श के दौरान अधिकारियों या कमिशनर्स द्वारा दी गई शुरुआती टिप्पणियों या सवालों को 'कानूनी असहमति' या आयोग का अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।

क्या है पूरा विवाद और क्यों खड़े हुए सवाल?

  • मीडिया रिपोर्ट्स का असर: सितंबर 2026 में आई एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया था कि दो अन्य चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी) ने 10 महीनों में 14 बार फॉर्म 6 और डेटाबेस पहुंच जैसे मुद्दों पर आपत्ति जताई थी।
  • याचिकाकर्ताओं की दलील: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब कमिशनर्स के बीच असहमति थी, तो अकेले CEC कैसे फैसले ले सकते हैं। इसलिए उन्होंने CEC को रोकने की मांग की है।
  • कानूनी स्थिति: फिलहाल कोर्ट यह तय करेगा कि अंदरूनी चर्चाओं के दौरान उठी आपत्तियां क्या वास्तव में कानूनी मतभेद थीं या नहीं।