क्या 1 जून 2026 से सेंट्रल रेलवे स्टेशनों पर वड़ा पाव, समोसा और डोसा अचानक महंगे हो जाएंगे? क्या आलू वड़ा ₹15 और पाव भाजी ₹50 होने से यात्रियों का बजट बिगड़ जाएगा? क्या रेलवे का यह कदम सिर्फ कीमत बढ़ोतरी है या क्वालिटी सुधार का असली बदलाव? क्या रेगुलर इंस्पेक्शन और नई रेट लिस्ट से ओवरचार्जिंग पूरी तरह खत्म हो पाएगी?
Central Railway Food Price Hike: सेंट्रल रेलवे के स्टेशनों पर सफर करने वाले यात्रियों की जेब अब और ढीली होने वाली है। रेलवे प्रशासन ने स्टेशनों पर स्थित छोटे स्टैटिक केटरिंग स्टॉल (Static Catering Stalls) पर मिलने वाले पॉपुलर स्नैक्स की कीमतों में संशोधन को मंजूरी दे दी है। यह नया मेन्यू और बढ़ी हुई दरें 1 जून से पूरी तरह लागू हो जाएंगी। हालांकि, इस महंगाई के बदले यात्रियों को बेहतर क्वालिटी का भरोसा भी दिया जा रहा है। इस पूरे फैसले और नए रेट कार्ड की मुख्य बातें नीचे विस्तार से दी गई हैं:

“नई दरें क्यों लागू की गईं?” रेलवे का तर्क क्या है?
रेलवे प्रशासन के अनुसार यह निर्णय केटरिंग सिस्टम को अधिक व्यवस्थित करने, गुणवत्ता सुधारने और ओवरचार्जिंग पर रोक लगाने के उद्देश्य से लिया गया है। साथ ही, वेंडर्स को यह निर्देश दिया गया है कि वे खाने की गुणवत्ता में सुधार करें और तय मानकों का पालन करें।
नया मेन्यू, नए दाम-क्या-क्या हुआ महंगा?
1 जून से लागू होने वाली नई दरों के अनुसार:
- आलू वड़ा (50 ग्राम)-₹15
- एक पाव (वड़ा के साथ) -₹5
- वेज समोसा / वेज पफ / साबूदाना वड़ा - ₹20 प्रत्येक
- वेज पिज़्ज़ा-₹50
- पाव भाजी -₹50
ये बदलाव खासतौर पर उन स्टेशनों पर लागू होंगे जहां छोटे स्टैटिक स्टॉल्स के जरिए फास्ट फूड बेचा जाता है।
साउथ इंडियन फूड में भी बदलाव -किन सीमित
- मसाला डोसा-₹35
- इडली (2 पीस, सांभर व चटनी के साथ)-₹30
हालांकि, कुछ लोकप्रिय आइटम्स की कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया गया है:
- मिसल पाव-₹35 (स्थिर)
- कचौरी-₹15 (स्थिर)
- दाबेली-₹20 (स्थिर)
निगरानी और सख्ती-क्या वेंडर्स पर बढ़ेगा दबाव?
रेलवे प्रशासन ने साफ निर्देश दिए हैं कि:
- सभी स्टॉल्स पर बाइलिंगुअल (दो भाषाओं वाली) रेट लिस्ट लगाना अनिवार्य होगा
- यात्रियों से ओवरचार्जिंग रोकने के लिए नियमित निरीक्षण किए जाएंगे
- खाने की गुणवत्ता सुनिश्चित करना वेंडर्स की जिम्मेदारी होगी
यात्रियों के लिए संकेत-सुविधा बढ़ेगी या खर्च?
हालांकि रेलवे का दावा है कि यह कदम पारदर्शिता और गुणवत्ता सुधार के लिए है, लेकिन यात्रियों के बीच चिंता यह भी है कि रोजमर्रा के सफर में छोटा-छोटा खर्च अब मिलकर बड़ा बोझ बन सकता है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि 1 जून के बाद स्टेशनों पर यह नई व्यवस्था कितनी प्रभावी और नियंत्रित साबित होती है।


