Green Hydrogen: चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के वैज्ञानिकों ने एक 250 किलोवाट का प्लांट तैयार किया है, जो समुद्र के खारे पानी से यूरेनियम निकालने के साथ-साथ 99.9999 प्रतिशत शुद्ध ग्रीन हाइड्रोजन और मीठा पानी बना सकता है।
Seawater Hydrogen Production: समुद्र का खारा पानी अब सिर्फ नमक या समुद्री संसाधनों का स्रोत नहीं रहेगा। चीन के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित करने का दावा किया है, जिसमें समुद्री जल का इस्तेमाल करके एक ही प्रक्रिया में मीठा पानी और ग्रीन हाइड्रोजन तैयार किया जा सकता है। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में समुद्री पानी में मौजूद कुछ उपयोगी तत्वों को भी अलग किया जा सकता है।
यह शोध चाइनीज एकेडमी ऑफ साइंसेज के डालियान इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल फिजिक्स के वैज्ञानिकों ने किया है। डेंग देहुई और लियू यानटिंग के नेतृत्व में हुई यह रिसर्च Nature Energy जर्नल में प्रकाशित हुई है।
समुद्री पानी से एक साथ दो बड़े काम
नई तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें समुद्री पानी से हाइड्रोजन तैयार करने के साथ-साथ मीठा पानी भी बनाया जाता है। शोधकर्ताओं ने हाइड्रोजन उत्पादन के दौरान निकलने वाली गर्मी को दोबारा इस्तेमाल करने का तरीका खोजा है।
हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया में करीब 80 से 90 डिग्री सेल्सियस तापमान पर गर्मी पैदा होती है। सामान्य तौर पर इस गर्मी का एक हिस्सा बेकार चला जाता है, लेकिन नई व्यवस्था में इसका इस्तेमाल समुद्री पानी को गर्म करने के लिए किया जाता है।
गर्मी से तैयार होगा मीठा पानी
शोधकर्ताओं के मुताबिक, सिस्टम में समुद्री पानी को करीब 40 से 50 डिग्री सेल्सियस तापमान पर वाष्पित किया जाता है। इसके बाद भाप को ठंडा करके मीठा पानी तैयार किया जाता है। इस तरह हाइड्रोजन उत्पादन से निकलने वाली गर्मी का भी इस्तेमाल हो जाता है और पानी भी प्राप्त होता है। इस व्यवस्था से पारंपरिक तकनीक की तुलना में बिजली के इस्तेमाल की दक्षता करीब 14.4 प्रतिशत तक बेहतर बताई गई है।
सीधे समुद्री पानी से हाइड्रोजन बनाना क्यों मुश्किल?
समुद्री पानी में मौजूद क्लोराइड आयन हाइड्रोजन बनाने वाले इलेक्ट्रोड को नुकसान पहुंचा सकते हैं। वहीं कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे तत्व इलेक्ट्रोड की सतह पर परत जमा कर देते हैं। इससे सिस्टम की क्षमता और लंबे समय तक काम करने की स्थिरता प्रभावित होती है।
अब तक समुद्री पानी को पहले डिसेलिनेट किया जाता था और उसके बाद उससे हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया अपनाई जाती थी। इसमें अतिरिक्त बिजली और संसाधनों की जरूरत पड़ती थी। नई व्यवस्था इन दोनों प्रक्रियाओं को ज्यादा कुशल तरीके से जोड़ने की कोशिश करती है।
250 किलोवाट का प्लांट, लाखों घन मीटर हाइड्रोजन
शोधकर्ताओं ने वर्ष 2023 में 25 किलोवाट क्षमता वाली एक छोटी इकाई तैयार की थी। अब इसे बढ़ाकर 250 किलोवाट की प्रणाली में बदल दिया गया है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, यह प्रणाली सालाना करीब 3.8 लाख घन मीटर हाइड्रोजन तैयार कर सकती है। इसकी शुद्धता 99.9999 प्रतिशत तक दर्ज की गई है। इसके साथ करीब 256 टन मीठा पानी भी तैयार होता है।
40 दिनों तक लगातार किया गया परीक्षण
इस तकनीक की स्थिरता जांचने के लिए सिस्टम को करीब 40 दिनों तक रोजाना चालू और बंद करके परीक्षण किया गया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस दौरान प्रणाली ने स्थिर प्रदर्शन किया। अगर यह तकनीक बड़े स्तर पर आर्थिक रूप से सफल होती है, तो समुद्री इलाकों में स्वच्छ ऊर्जा और मीठे पानी की उपलब्धता बढ़ाने में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।
अब AI और बेहतर कैटेलिस्ट पर नजर
शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य इस प्रक्रिया को और अधिक कुशल बनाना है। इसके लिए बेहतर कैटेलिस्ट विकसित करने के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से पूरी प्रणाली को अनुकूलित करने पर काम किया जा रहा है।
कम लागत वाली बिजली उपलब्ध होने पर इस तकनीक से हाइड्रोजन उत्पादन की लागत घटने की उम्मीद है। ऐसे में समुद्री जल से एक साथ स्वच्छ ईंधन और मीठा पानी बनाने की यह तकनीक भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा व्यवस्था के लिए अहम साबित हो सकती है।
