DJ Controversy: DJ विवाद के बाद ढोल-ताशा समूहों ने परंपरा और लाइव वादन पर जोर देते हुए आयोजकों से अपील की है कि शोभायात्राओं में पारंपरिक धुनों को प्राथमिकता दी जाए और ध्वनि अनुशासन का पालन हो।
Festival Processions: त्योहारों और शोभायात्राओं में DJ की तेज आवाज, गीतों और ध्वनि-सीमा को लेकर उठने वाले विवादों के बीच ढोल-ताशा समूहों ने आने वाले आयोजनों को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। इन समूहों का जोर अब पारंपरिक वादन, लाइव प्रस्तुति और सामूहिक तालमेल पर है। उनका कहना है कि इससे त्योहारों की सांस्कृतिक पहचान भी बनी रहेगी और जुलूसों में अनुशासन भी कायम रखा जा सकेगा।
समूहों के मुताबिक, ढोल-ताशा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सामुदायिक भागीदारी, नियमित अभ्यास और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा हुआ है। उनका मानना है कि लाइव वादन जुलूस को ऊर्जा देने के साथ उसकी लय और गरिमा को भी बनाए रखता है।
DJ विवाद के बीच परंपरागत वादन पर बढ़ा जोर
ध्वनि और DJ को लेकर होने वाले विवादों के बाद कई ढोल-ताशा समूह आयोजकों से पारंपरिक टुकड़ियों को शोभायात्रा में पर्याप्त और व्यवस्थित समय देने की अपील कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर वादन के लिए पहले से तय समय और स्थान मिले तो प्रस्तुति बेहतर तरीके से हो सकती है और भीड़ को संभालना भी आसान रहेगा।
समूहों का कहना है कि एक ढोल-ताशा दल के पीछे लंबे समय का अभ्यास और सामूहिक मेहनत होती है। इसमें युवाओं को तालमेल, अनुशासन और टीम के साथ काम करने की सीख मिलती है।
सिर्फ शोर नहीं, सांस्कृतिक पहचान है ढोल-ताशा
ढोल-ताशा समूहों के मुताबिक पारंपरिक धुनें स्थानीय संस्कृति, लोक परंपराओं और सामुदायिक स्मृतियों से जुड़ी होती हैं। जब इन्हें शोभायात्रा में लाइव बजाया जाता है तो यह केवल संगीत नहीं रहता, बल्कि लोगों की सामूहिक भागीदारी का हिस्सा बन जाता है।
कदमताल, वेशभूषा और एक साथ वादन की प्रस्तुति जुलूस को एक अलग पहचान देती है। समूहों का मानना है कि सीमित और व्यवस्थित धुनें माहौल में ऊर्जा बनाए रखते हुए अनावश्यक शोर से भी बचा सकती हैं।
लाइव वादन में लय के साथ अनुशासन भी
पारंपरिक वादन की खासियत बताते हुए समूहों का कहना है कि लाइव प्रस्तुति में ध्वनि का संतुलन, विराम और क्रम स्वाभाविक रूप से बना रहता है। इससे जुलूस में शामिल लोगों के साथ-साथ रास्ते में मौजूद आम लोगों, बुजुर्गों और बच्चों के लिए भी माहौल अपेक्षाकृत सहज रह सकता है।
उनके अनुसार, बड़ी संख्या में कलाकारों का एक साथ अभ्यास और प्रस्तुति करना खुद में अनुशासन की मिसाल है। इसलिए आयोजनों में पारंपरिक दलों के लिए पर्याप्त दूरी और व्यवस्थित मार्ग उपलब्ध कराना जरूरी है।
आयोजकों से समय और स्थान तय करने की अपील
ढोल-ताशा समूह चाहते हैं कि शोभायात्रा शुरू होने से पहले आयोजक अलग-अलग वादन दलों के लिए स्पष्ट समय-खंड तय करें। इससे कई समूहों की प्रस्तुतियां आपस में नहीं टकराएंगी और जुलूस का प्रवाह भी बेहतर बना रहेगा।
समूहों का मानना है कि पारंपरिक वादन को व्यवस्थित जगह मिलने से कलाकारों को अपनी प्रस्तुति दिखाने का अवसर मिलेगा और दर्शकों के लिए भी कार्यक्रम ज्यादा आकर्षक और अनुशासित रहेगा।
DJ हो या लाइव वादन, नियम सभी के लिए समान हों
समूहों ने यह भी स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य किसी एक संगीत शैली का विरोध करना नहीं है। उनकी मांग है कि DJ और लाइव वादन, दोनों के लिए ध्वनि-स्तर, समय-सीमा और मार्ग-प्रबंधन से जुड़े नियम स्पष्ट हों और सभी पर समान रूप से लागू किए जाएं।
उनका कहना है कि स्पष्ट दिशा-निर्देश और प्रशासन-आयोजक के बीच बेहतर समन्वय से विवाद कम किए जा सकते हैं। साथ ही, त्योहारों की सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत किया जा सकता है।
त्योहारों में फिर गूंजेगी परंपरा की ताल?
ढोल-ताशा समूहों का बढ़ता जोर इस बात का संकेत है कि आधुनिक संगीत के साथ पारंपरिक वादन को भी शोभायात्राओं में प्रमुख स्थान देने की कोशिश हो रही है। उनका मानना है कि लाइव, सामूहिक और अनुशासित वादन त्योहारों के उत्साह को बनाए रखते हुए उनकी सांस्कृतिक आत्मा को भी जीवित रख सकता है।
