अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने राष्ट्रपति ट्रंप के युद्ध अधिकार सीमित करने का प्रस्ताव पास किया है। यह ईरान पर कार्रवाई के बाद एक झटका है, लेकिन उन्हें ICE फंड जैसे अन्य बिलों पर जीत भी मिली। यह प्रस्ताव अभी सीनेट से पास होना बाकी है।

मेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक छोटा-सा झटका लगा है। वहां की प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) ने राष्ट्रपति के युद्ध से जुड़े अधिकार सीमित करने वाला एक प्रस्ताव पास कर दिया है। हालांकि, इसे अभी सीनेट से भी पास होना होगा, लेकिन फिर भी यह ट्रंप के लिए एक हार की तरह है। वहीं, दो दूसरे विवादित बिलों पर ट्रंप को जीत मिली है। इमिग्रेशन से जुड़ा ICE बिल पास हो गया और एंटी-वेपनाइज़ेशन फंड (Anti-Weaponization Fund) पर भी रोक नहीं लगी। सिर्फ एक रिपब्लिकन सदस्य ने इसके खिलाफ वोट दिया। यह एंटी-वेपनाइज़ेशन फंड एक अजीब मामला है, जिसे ट्रंप सरकार ने कुछ अजीब वजहों से ही खत्म करने का फैसला किया। दूसरी तरफ, रिपब्लिकन सदस्यों ने राष्ट्रपति की राय के खिलाफ जाकर यूक्रेन को फंड देने की मंजूरी दे दी।

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'अपने ही लोगों की बलि दे रहे'

जब अमेरिकी राष्ट्रपति ने कांग्रेस की इजाज़त के बिना ईरान पर हमला शुरू किया, तभी से डेमोक्रेट्स ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया था। यहां तक कि रिपब्लिकन पार्टी में भी इसे लेकर नाराजगी थी। कई मौके मिलने के बावजूद ट्रंप युद्ध खत्म करने को तैयार नहीं थे, जिससे विरोध और बढ़ गया। आरोप लगने लगे कि ट्रंप इज़राइल के दबाव में आकर अपने ही लोगों की जान जोखिम में डाल रहे हैं। इसी सब का नतीजा है 'वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन' (War Powers Resolution)। फिलहाल ये सिर्फ हाउस से पास हुआ है और इसे सीनेट से भी पास होना होगा। अगर ये पास हो भी गया तो कानूनी तौर पर बाध्यकारी नहीं होगा। लेकिन राजनीतिक तौर पर, यह राष्ट्रपति की मनमानी पर एक लगाम की तरह है। चार रिपब्लिकन सदस्यों ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया।

व्हाइट हाउस ने इसे पूरी तरह खारिज करते हुए असंवैधानिक बताया। यह चौथी बार है जब हाउस ने इस तरह के प्रस्ताव पर विचार किया है। सीनेट में भी ऐसा ही एक प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन उस पर वोटिंग नहीं हुई। माना जा रहा है कि इस प्रस्ताव को मिला समर्थन रिपब्लिकन पार्टी के अंदर की फूट को दिखाता है।

क्या है वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन?

यह 1973 का एक कानून है, जिसका मकसद राष्ट्रपतियों के अधिकारों की सीमा तय करना है। यह कानून कहता है कि राष्ट्रपति कांग्रेस की मंजूरी के बिना किसी सशस्त्र संघर्ष के लिए सेना नहीं भेज सकते। आसान भाषा में कहें तो भले ही राष्ट्रपति सशस्त्र बलों के कमांडर-इन-चीफ हों, लेकिन युद्ध की घोषणा के लिए कांग्रेस की मंजूरी ज़रूरी है। फंड देने का अधिकार भी कांग्रेस के पास ही है। सेना भेजने के 48 घंटों के अंदर राष्ट्रपति को कांग्रेस को सूचित करना होता है। अगर कांग्रेस मंजूरी नहीं देती, तो 60 दिनों के अंदर युद्ध खत्म करना होता है और सेना वापस बुलानी पड़ती है। सेना की वापसी के लिए 30 दिन का अतिरिक्त समय मिल सकता है।

1950 और 60 के दशक में कोरिया और वियतनाम युद्धों की वजह से कांग्रेस में भारी विरोध हुआ था। राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने कोरिया में सेना भेजने का आदेश दिया था। वियतनाम युद्ध में केनेडी, जॉनसन और निक्सन जैसे 3 राष्ट्रपति शामिल हुए। वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिका ने कंबोडिया पर भी बमबारी की। इन्हीं सब घटनाओं के चलते वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन लाया गया। राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इसे वीटो कर दिया था, लेकिन कांग्रेस ने वीटो को दरकिनार कर कानून लागू कर दिया। इस कानून के बाद से राष्ट्रपतियों ने 132 रिपोर्टें कांग्रेस में पेश की हैं, जिसमें 1991 का खाड़ी युद्ध भी शामिल है।

जिन्होंने कानून तोड़ा

लेकिन इस कानून को चुनौती देने वाले राष्ट्रपतियों में बराक ओबामा भी शामिल हैं, जिन्होंने लीबिया में सैन्य कार्रवाई की थी। रोनाल्ड रीगन ने भी कानून का उल्लंघन कर अल सल्वाडोर में सेना भेजी थी। बिल क्लिंटन का कोसोवो पर बमबारी का आदेश भी कानून का उल्लंघन था। हालांकि, इन उल्लंघनों को अदालत में ले जाने की कोशिशें नाकाम रहीं।

लगातार उल्लंघनों के कारण यह कानून शुरुआत से ही विवादों में रहा है। राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच इस बात पर हमेशा बहस होती है कि यह कानून किन सैन्य कार्रवाइयों पर लागू होता है। अब सीनेट में इस प्रस्ताव का क्या होगा, यह साफ नहीं है। अगर यह मंजूर हो भी जाता है, तो इसकी कानूनी वैधता भी स्पष्ट नहीं है, जिसकी एक वजह 1983 का सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला है।

हार और जीत

सीनेट ने यूक्रेन फंड पास कर दिया, जो ट्रंप के लिए एक झटका है। लेकिन ICE फंड भी पास हो गया, जो उनके लिए एक जीत है। अप्रवासन विरोधी कार्रवाइयों के लिए 70 बिलियन डॉलर का यह फंड डेमोक्रेट्स के समर्थन के बिना पास हुआ। विवादों के कारण यह फंड पहले अटका हुआ था।

एंटी-वेपनाइज़ेशन फंड का खेल

ICE फंड को इस एंटी-वेपनाइज़ेशन फंड पर रोक लगाए बिना पास किया गया। यह एक अजीब फंड है, जिसे राष्ट्रपति का अपने समर्थकों के लिए तोहफा कहा जा रहा है। इसके तहत उन लोगों को मुआवजा दिया जाना था जो किसी तरह की नाइंसाफी का शिकार हुए, खासकर बाइडेन सरकार के दौरान। इसमें 6 जनवरी को कैपिटल हिल में हुए दंगे के आरोपी भी शामिल हैं, जिन्हें ट्रंप 'ग्रेट मेन' कहते हैं। यह 1.8 बिलियन डॉलर का फंड था। यह फंड एक डील का हिस्सा था। ट्रंप ने अपनी टैक्स जानकारी लीक होने पर इंटरनल रेवेन्यू सर्विस (IRS) के खिलाफ 10 बिलियन डॉलर का मुकदमा वापस ले लिया, जिसके बदले में यह मुआवजा फंड बनाया गया। डेमोक्रेट्स ने आरोप लगाया कि जनता का पैसा दंगाईयों और श्वेत वर्चस्ववादियों में बांटा जा रहा है। 90 सदस्यों ने इसके खिलाफ प्रस्ताव भी लाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

लेकिन इसमें एक मजेदार बात भी है। जो लोग ट्रंप की आलोचना करने की वजह से कानूनी पचड़ों में फंसे, वे भी इसके लिए आवेदन कर सकते थे। FBI के पूर्व डायरेक्टर जेम्स कोमी, जिन पर ट्रंप ने मुकदमा चलाने की कोशिश की थी, ने कहा कि वह भी आवेदन करेंगे। ट्रंप के पूर्व वकील माइकल कोहेन, जो बाद में उनके खिलाफ गवाह बन गए, वो भी आवेदन कर सकते थे। खैर, आखिर में सरकार ने यह फंड नहीं बनाने का फैसला किया।

ट्रंप का टैक्स!

यह पूरा मामला ट्रंप के टैक्स से जुड़ा है। जानकारी लीक हुई थी कि 2016 में, जिस साल वे चुनाव जीते, ट्रंप ने सिर्फ 750 डॉलर टैक्स दिया था और उससे पहले के 15 सालों में से 10 साल कोई टैक्स ही नहीं दिया। जानकारी लीक करने वाले को 5 साल की जेल भी हुई। ट्रंप ने रेवेन्यू विभाग पर मुकदमा किया था, और अब उसी केस में यह डील हुई थी।