दुनिया बदल गई, UN Security Council नहीं! एर्दोगन ने 5 देशों की वीटो पावर पर उठाए सवाल
Erdogan on UN Veto Power: तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने UN सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की वीटो पावर खत्म करने की मांग की है। जानिए वीटो क्या है, पांच देशों को यह अधिकार क्यों मिला और इसे खत्म करना इतना मुश्किल क्यों है।

एर्दोगन ने उठाई वीटो खत्म करने की मांग
दुनिया में जब कोई युद्ध, मानवीय संकट या बड़ा अंतरराष्ट्रीय विवाद सामने आता है, तो निगाहें संयुक्त राष्ट्र की ओर टिक जाती हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कई अहम प्रस्तावों का भविष्य सिर्फ बहुमत से तय नहीं होता। इसी व्यवस्था पर अब तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने सवाल उठाते हुए स्थायी सदस्यों की वीटो पावर खत्म करने की मांग की है।

एर्दोगन ने क्यों उठाया वीटो का मुद्दा?
एर्दोगन ने Bloomberg में प्रकाशित एक लेख में संयुक्त राष्ट्र में व्यापक सुधार की जरूरत बताई। उनका तर्क है कि दुनिया 1945 के दौर से काफी बदल चुकी है, लेकिन सुरक्षा परिषद की मूल शक्ति-संरचना अब भी उसी दौर की व्यवस्था पर आधारित है।
उनके मुताबिक, वैश्विक समस्याओं पर फैसले कुछ देशों की इच्छा पर निर्भर नहीं होने चाहिए। एर्दोगन ने वीटो के विशेष अधिकार को खत्म करने को UN सुधार का अहम कदम बताया और ज्यादा प्रतिनिधित्व वाली व्यवस्था की वकालत की।
क्या है UN Security Council की वीटो पावर?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका पांच स्थायी सदस्य हैं। बाकी 10 सदस्य दो साल के लिए चुने जाते हैं।
सुरक्षा परिषद के गैर-प्रक्रियात्मक मामलों में प्रस्ताव पास करने के लिए कम से कम 9 वोट जरूरी होते हैं और स्थायी सदस्यों की सहमति भी आवश्यक होती है। किसी स्थायी सदस्य का नकारात्मक वोट प्रस्ताव को रोक सकता है। इसे ही आम तौर पर वीटो पावर कहा जाता है। हालांकि स्थायी सदस्य मतदान से अनुपस्थित यानी abstain करे तो प्रस्ताव जरूरी वोट मिलने पर पारित हो सकता है।
एर्दोगन चाहते हैं ज्यादा देशों की भागीदारी
एर्दोगन ने ऐसी व्यवस्था की बात की है जिसमें दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों को सुरक्षा परिषद में ज्यादा प्रतिनिधित्व मिले। उनका प्रस्तावित रास्ता केवल मौजूदा ढांचे में छोटे बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि वह महासभा के जरिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की बात कर रहे हैं।
उनका कहना है कि किसी एक देश के पास ऐसा स्थायी अधिकार नहीं होना चाहिए जिससे वह बाकी देशों के बहुमत की राय को रोक सके।
वीटो खत्म करना इतना मुश्किल क्यों है?
यही इस मांग का सबसे अहम पहलू है। वीटो पावर को खत्म करने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बदलाव करना होगा। UN चार्टर के Article 108 के अनुसार संशोधन के लिए महासभा में दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन और फिर दो-तिहाई सदस्य देशों द्वारा अनुमोदन जरूरी है। इसमें सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्यों की मंजूरी भी अनिवार्य है।
यानी जिस व्यवस्था में बदलाव की मांग हो रही है, उसे बदलने की प्रक्रिया में उन्हीं पांच स्थायी सदस्यों की सहमति जरूरी होगी जिनके पास आज वीटो अधिकार है। इसी वजह से वीटो खत्म करने का सवाल सिर्फ राजनीतिक बहस नहीं, बल्कि UN Charter में बड़े संस्थागत बदलाव से भी जुड़ा है।
वीटो पर पहले से चलती रही है बहस
सुरक्षा परिषद की वीटो व्यवस्था लंबे समय से UN सुधार की बहस का हिस्सा रही है। संयुक्त राष्ट्र के भीतर भी वीटो के इस्तेमाल, जवाबदेही और सुरक्षा परिषद के प्रतिनिधित्व को लेकर अलग-अलग सुधार प्रस्ताव सामने आते रहे हैं।
एर्दोगन की ताजा मांग ने इस पुरानी बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। फिलहाल यह एक राजनीतिक प्रस्ताव है; इसे लागू करने के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर में निर्धारित कठिन संशोधन प्रक्रिया से गुजरना होगा।
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