देश में चीनी की बढ़ती कीमतों और संभावित संकट को लेकर सरकार ने बड़ा बयान दिया है। सरकार ने इथेनॉल ब्लेंडिंग को इस स्थिति के लिए जिम्मेदार मानने से इनकार कर दिया है और संकट की असली वजहों पर बात की है।
देश में चीनी की कीमतों और उसकी उपलब्धता को लेकर चल रही चिंताओं के बीच सरकार ने अपना पक्ष साफ किया है। सरकार ने उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया है जिनमें कहा जा रहा था कि इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल बढ़ने से चीनी का संकट पैदा हुआ है। सरकार के मुताबिक, इस संकट के लिए इथेनॉल ब्लेंडिंग को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह से गलत है।
सरकार ने इस पूरे मामले पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि चीनी संकट के पीछे की वजह कुछ और है। हालांकि, इथेनॉल प्रोग्राम सरकार की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक अहम हिस्सा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसे चीनी की कीमत पर आगे बढ़ाया जा रहा है। यह बयान उन अटकलों पर लगाम लगाने की कोशिश है, जिनमें चीनी उत्पादन में कमी का ठीकरा इथेनॉल पॉलिसी पर फोड़ा जा रहा था।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, पिछले कुछ समय से ऐसी खबरें आ रही थीं कि देश में चीनी का उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह यह बताई जा रही थी कि सरकार पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने के अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए चीनी मिलों को गन्ने के रस से सीधे इथेनॉल बनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है। तर्क यह था कि अगर ज्यादा गन्ना इथेनॉल बनाने में चला जाएगा, तो चीनी का उत्पादन कम होगा और संकट गहराएगा।
इसी बहस पर विराम लगाते हुए सरकार ने अब मोर्चा संभाला है। सरकार ने न सिर्फ इथेनॉल को 'निर्दोष' बताया है, बल्कि यह भी दावा किया है कि चीनी संकट के 'असली विलेन' कोई और हैं। सरकार ने इस संकट की असल वजहों का खुलासा करने की बात कही है, जिससे तस्वीर और साफ हो सके।
सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि वह स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जरूरी उपाय कर रही है। इन उपायों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि घरेलू बाजार में चीनी की कोई कमी न हो और कीमतें भी स्थिर रहें। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार के इन दावों और उपायों का जमीनी स्तर पर कितना असर दिखता है।


