Iran US Ceasefire Agreement: होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने की ईरान की योजना कितनी व्यावहारिक है? यदि ईरान ट्रांजिट शुल्क लागू करता है तो वैश्विक तेल कीमतों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर क्या असर पड़ेगा? क्या अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून ईरान को होर्मुज स्ट्रेट पर टोल या सेवा शुल्क वसूलने की अनुमति देता है?
Hormuz Strait Toll Charges: दुनिया की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वालों की निगाहें इन दिनों एक बार फिर होर्मुज स्ट्रेट पर टिक गई हैं। करीब 100 दिनों से अधिक समय तक चले अमेरिका-ईरान संघर्ष के बाद अब युद्धविराम की संभावनाएं मजबूत होती दिखाई दे रही हैं। इसी बीच ऐसी रिपोर्टें सामने आई हैं कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क लगाने के विकल्प पर विचार कर रहा है।

यदि ऐसा होता है तो यह केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाला कदम साबित हो सकता है। कारण साफ है, दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है।
क्यों इतना महत्वपूर्ण है होर्मुज स्ट्रेट?
होर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी को अरब सागर और खुले समुद्र से जोड़ता है। यह दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में गिना जाता है। सऊदी अरब, इराक, कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देशों का निर्यात इसी रास्ते से दुनिया तक पहुंचता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार वैश्विक स्तर पर समुद्री मार्ग से होने वाले तेल व्यापार का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा और बड़ी मात्रा में LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) इसी मार्ग से होकर गुजरती है।
प्रति बैरल 1 डॉलर शुल्क लगाने पर विचार
हालिया रिपोर्टों के मुताबिक ईरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले तेल टैंकरों पर प्रति बैरल लगभग 1 डॉलर का ट्रांजिट शुल्क लगाने की संभावना पर अध्ययन कर रहा है। ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का अनुमान है कि यदि यह मॉडल पूरी तरह लागू हो जाता है तो ईरान को हर साल 70 से 80 अरब डॉलर तक अतिरिक्त राजस्व मिल सकता है। यह राशि कई बार उसके वार्षिक तेल निर्यात से होने वाली कमाई से भी अधिक हो सकती है।
तेल निर्यात से ज्यादा हो सकती है कमाई
उपलब्ध आर्थिक आंकड़ों के अनुसार ईरान ने वर्ष 2023 में तेल निर्यात से लगभग 41.1 अरब डॉलर की कमाई की थी। वहीं 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर करीब 46.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया। यदि ट्रांजिट शुल्क से 70-80 अरब डॉलर की आय होती है तो यह ईरान के लिए तेल बिक्री से भी बड़ा राजस्व स्रोत बन सकता है। यही कारण है कि इस प्रस्ताव पर वैश्विक स्तर पर गंभीर चर्चा हो रही है।
युद्ध और प्रतिबंधों के बावजूद बढ़ी तेल आय
अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और क्षेत्रीय संघर्षों के बावजूद ईरान ने पिछले कुछ वर्षों में अपने तेल निर्यात को पूरी तरह प्रभावित नहीं होने दिया। रिपोर्टों के अनुसार मार्च 2026 में ईरान की दैनिक तेल आय लगभग 139 मिलियन डॉलर तक पहुंच गई, जबकि फरवरी में यह करीब 115 मिलियन डॉलर थी। इसके अलावा उसका कच्चे तेल का निर्यात लगभग 16 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर पर बना हुआ है। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईरानी तेल पर मिलने वाली छूट कम होने से भी उसकी आय में बढ़ोतरी हुई है।
कैसे शुरू हुआ होर्मुज संकट?
फरवरी के अंत में क्षेत्रीय तनाव तब और बढ़ गया जब अमेरिका और इजराइल की सैन्य कार्रवाई के जवाब में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही को सीमित कर दिया। इस कदम का असर पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर पड़ा। तेल की कीमतों में तेजी आई, शिपिंग कंपनियों की लागत बढ़ी और कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई। हजारों जहाज दोनों तरफ प्रतीक्षा में फंस गए, जिससे वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ।
समुद्र में खड़े जहाजों की बढ़ती लागत
शिपिंग उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी जहाज का लंबे समय तक समुद्र में खड़ा रहना बेहद महंगा सौदा होता है। जहाज मालिकों को चालक दल का वेतन, ईंधन, रखरखाव, बीमा प्रीमियम, बैंक ऋण की किश्तें और सुरक्षा खर्च लगातार वहन करने पड़ते हैं। युद्ध क्षेत्र के कारण बीमा कंपनियां अतिरिक्त जोखिम शुल्क भी वसूलती हैं। इसी वजह से कई कंपनियों के लिए सीमित शुल्क देकर आगे बढ़ना, लंबे समय तक फंसे रहने से अधिक किफायती विकल्प माना जाता है।
क्या ईरान पहले से शुल्क वसूल रहा है?
कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में दावा किया गया है कि संघर्ष के दौरान कुछ जहाजों को मार्ग देने के बदले भारी रकम ली गई। कुछ मामलों में यह राशि 20 लाख डॉलर प्रति जहाज तक बताई गई है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि ईरान अपने सामरिक महत्व को आर्थिक अवसर में बदलने की संभावनाओं का आकलन कर रहा है।
क्या अंतरराष्ट्रीय कानून इसकी अनुमति देता है?
यहीं सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल सामने आता है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत होर्मुज स्ट्रेट एक प्राकृतिक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग माना जाता है। ऐसे मार्गों में सभी देशों के जहाजों को निर्बाध आवाजाही का अधिकार प्राप्त होता है। इसलिए केवल रास्ते से गुजरने के लिए सीधा टोल लगाना कानूनी चुनौती पैदा कर सकता है। हालांकि समुद्री सुरक्षा, नेविगेशन, ट्रैफिक प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, खोज एवं बचाव सेवाओं जैसी सुविधाओं के लिए सेवा शुल्क लेने की व्यवस्था संभव मानी जाती है।
पनामा और स्वेज नहर से क्यों अलग है होर्मुज?
अक्सर होर्मुज की तुलना पनामा और स्वेज नहर से की जाती है, लेकिन दोनों परिस्थितियां अलग हैं। पनामा और स्वेज नहर मानव निर्मित जलमार्ग हैं। उनके निर्माण, संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी संबंधित देशों के पास है, इसलिए वहां टोल शुल्क लिया जाता है। वहीं होर्मुज एक प्राकृतिक समुद्री मार्ग है और इसके आसपास कई देशों की समुद्री सीमाएं जुड़ी हुई हैं। ऐसे में किसी एक देश द्वारा एकतरफा शुल्क लागू करना आसान नहीं होगा।
भारत समेत दुनिया पर क्या होगा असर?
भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों की तेल और गैस आपूर्ति काफी हद तक होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भर करती है। यदि भविष्य में किसी प्रकार की स्थायी शुल्क व्यवस्था लागू होती है तो तेल परिवहन महंगा हो सकता है। इसका असर पेट्रोल, डीजल, गैस और अन्य ऊर्जा उत्पादों की कीमतों पर दिखाई दे सकता है। दूसरी ओर यदि अमेरिका और ईरान के बीच स्थायी युद्धविराम के बाद होर्मुज स्ट्रेट में सामान्य आवाजाही बहाल हो जाती है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिल सकती है और तेल कीमतों में स्थिरता आने की संभावना बढ़ सकती है।


