भारतीय नौसेना अपनी एंटी-मिसाइल रक्षा को मजबूत करने हेतु अगली पीढ़ी के एरियल टारगेट ड्रोन खरीदेगी। ये ड्रोन दुश्मन की तेज मिसाइलों की नकल कर लाइव-फायर अभ्यास में मदद करेंगे। रक्षा मंत्रालय ने स्वदेशीकरण पर जोर देते हुए इसके लिए RFI जारी किया है।

भारतीय नौसेना समुद्र में अपनी एंटी-मिसाइल रक्षा क्षमताओं को और मजबूत करने जा रही है। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने अगली पीढ़ी के एक्सपेंडेबल एरियल टारगेट (EAT NG) ड्रोन के लिए जानकारी मांगी है (RFI जारी किया है)। ये ड्रोन दुश्मन की तेज रफ्तार एंटी-शिप मिसाइलों की तरह काम करेंगे, ताकि भारतीय नौसेना अपनी तैयारियों को और पुख्ता कर सके। यहां यह भी याद रखना जरूरी है कि DRDO का बनाया 'अभ्यास' नाम का एरियल टारगेट ड्रोन पहले ही कई सफल परीक्षणों के बाद बड़े पैमाने पर बनाया जा रहा है। इन नए ड्रोन्स को आधिकारिक तौर पर EAT (NG) यानी अगली पीढ़ी के एक्सपेंडेबल एरियल टारगेट कहा जाता है। लाइव-फायर अभ्यास के दौरान इन्हें मार गिराया जाएगा। इससे जंगी जहाजों के क्रू को समुद्र की सतह के करीब उड़ने वाली आधुनिक मिसाइलों जैसे खतरों से निपटने की असली ट्रेनिंग मिलेगी।

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काफी सख्त हैं शर्तें

नौसेना ने इन ड्रोन्स के लिए काफी कड़ी तकनीकी जरूरतें रखी हैं…

  • इस टारगेट ड्रोन की रफ्तार कम ऊंचाई पर कम से कम 300 मीटर प्रति सेकंड (लगभग Mach 0.87) होनी चाहिए।
  • यह 60 मिनट तक उड़ सके और समुद्र तल से सिर्फ पांच मीटर की ऊंचाई पर भी ऑपरेट कर सके।
  • इसकी चढ़ाई की रफ्तार 20 मीटर प्रति सेकंड से कम नहीं होनी चाहिए।
  • इसे 2G सस्टेन्ड टर्न लेने में भी सक्षम होना चाहिए, ताकि यह आज की एंटी-शिप मिसाइलों की तरह फुर्तीला हो।
  • ग्राउंड स्टेशन से इसका रेडियो कंट्रोल 100 किलोमीटर तक काम करना चाहिए। साथ ही, इसमें पहले से तय रास्ते पर खुद उड़ान भरने की क्षमता भी हो, जिसमें यह बीच रास्ते में अपनी स्पीड और ऊंचाई बदल सके।
  • ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन को एक साथ कम से कम छह टारगेट को कंट्रोल करना होगा।
  • अगर डेटा-लिंक फेल हो जाए, तो इसे यूजर के प्रोग्राम के मुताबिक रिकवर करने की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
  • इस ड्रोन का रडार क्रॉस-सेक्शन कम होना चाहिए, ताकि यह आसानी से रडार की पकड़ में न आए। लेकिन जरूरत पड़ने पर ट्रांसपोंडर या कॉर्नर रिफ्लेक्टर लगाकर इसका सिग्नेचर बढ़ाने का विकल्प भी होना चाहिए।
  • इसमें एकॉस्टिक मिस-डिस्टेंस इंडिकेटर लगाना भी जरूरी है। यह बताएगा कि 20mm तोप से लेकर सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें टारगेट के 10 मीटर के दायरे में कितनी करीब से गुजरीं।
  • इसे जहाज या किनारे, कहीं से भी रॉकेट की मदद से लॉन्च किया जा सके। यह सी-स्टेट 3 (समुद्र की खराब स्थिति) और 30 नॉट की तेज हवाओं में भी लॉन्च होने में सक्षम हो।
  • पानी में गिरने के बाद, ड्रोन को इतनी देर तक तैरते रहना होगा कि उसे नाव या हेलिकॉप्टर से रिकवर किया जा सके। इसकी अनुमानित सर्विस लाइफ 15 साल होगी।

स्वदेशीकरण पर जोर

यह RFI भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता अभियान का हिस्सा है। मंत्रालय ने वेंडरों से पूछा है कि क्या वे इन ड्रोन्स की सप्लाई 'बाय इंडियन-IDDM' कैटेगरी के तहत कर सकते हैं, जिसमें 50% से ज्यादा स्वदेशी सामान होना जरूरी है। दूसरा विकल्प 'बाय इंडियन' कैटेगरी है, जिसमें 60% से ज्यादा स्वदेशी सामान की शर्त है। ये दोनों कैटेगरी रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया 2020 के तहत आती हैं।

यह क्यों जरूरी है?

भारतीय नौसेना के जंगी जहाजों पर कई तरह के सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम तैनात हैं, जिनमें इजरायली बराक सीरीज भी शामिल है। इन मिसाइलों की क्षमता को परखने के लिए समय-समय पर असली जैसे टारगेट पर लाइव-फायरिंग की जरूरत पड़ती है। INS विक्रांत और INS विक्रमादित्य, दोनों के ऑपरेशनल होने और नौसेना के तेजी से हो रहे विस्तार के साथ, क्रू को एंटी-मिसाइल डिफेंस में माहिर बनाए रखना एक बड़ी प्राथमिकता बन गया है।