समाज कल्याण विभाग के प्रसेनजीत चक्रवर्ती को उनके सहकर्मी 'मुश्किल आसान' कहते हैं। वे पेंशन, सैलरी और अन्य कागजी कामों में सबकी मदद करते हैं। हाल ही में बीमार पड़ने के बाद वे फिर से काम पर लौट आए हैं और पहले की तरह ही सहकर्मियों की सहायता कर रहे हैं।
पश्चिम बंगालः सरकारी दफ़्तर का नाम सुनते ही अक्सर दिमाग में फाइलों का ढेर, जटिल नियम-कानून और उलझी हुई प्रक्रियाएं घूमने लगती हैं। लेकिन इसी माहौल के बीच अगर कोई ऐसा इंसान मिल जाए, जो हर किसी की समस्या सुलझाने के लिए हमेशा तैयार रहे, तो काम का सफ़र काफी आसान हो जाता है। समाज कल्याण विभाग के कर्मचारियों के लिए प्रसेनजीत चक्रवर्ती एक ऐसा ही भरोसे का नाम हैं। डायरेक्टोरेट ऑफ़ ICDS (शैशली भवन) के हेडक्वार्टर में एक अहम पद पर काम करने वाले प्रसेनजीत को उनके साथी 'मुश्किल आसान' बुलाते हैं।
किसी की पेंशन अटकी हो या किसी को सैलरी के लिए ज़रूरी कागज़ जमा करने हों, प्रसेनजीत हर मुश्किल में सबसे पहले मदद के लिए आगे आते हैं। कब, कौन-सा फॉर्म जमा करना है, कैसे करना है, और किन नियमों का पालन करना है, ये सारी जानकारी वह समय पर अपने सहकर्मियों तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी खुद उठाते हैं। जो कर्मचारी दूर-दराज़ के इलाकों में पोस्टेड हैं, उनका भी वह खास ख्याल रखते हैं। वह कोशिश करते हैं कि उन्हें बार-बार हेड ऑफिस आकर परेशान न होना पड़े।
फोन, मैसेज या किसी भी दूसरे तरीके से वह उनका काम आसान करने की पूरी कोशिश करते हैं। अगर ऑफिस के किसी कागज़ में कोई गलती हो, तो उसे कैसे ठीक करना है या समस्या का हल किस तरह निकलेगा, वह हर सवाल का जवाब बड़े धैर्य से देते हैं। कुछ समय पहले, काम के ज़्यादा दबाव और हाई ब्लड प्रेशर की वजह से प्रसेनजीत चक्रवर्ती की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। हालत इतनी गंभीर हो गई थी कि उनके कान से खून बहने लगा था। जैसे ही यह खबर दफ़्तर में फैली, सभी कर्मचारी उनके लिए चिंतित हो गए।
लगभग हर दिन कोई न कोई उनका हालचाल लेने आता और उनके जल्दी ठीक होने की दुआ करता। कुछ दिन आराम करने के बाद, वह फिर से काम पर लौट आए हैं और पहले की तरह ही अपने साथियों की मदद में जुट गए हैं। उनके सहकर्मी अक्सर कहते हैं कि प्रसेनजीत जैसे समर्पित और मददगार इंसान ही सही मायने में एक सच्चे 'पब्लिक सर्वेंट' हैं। क्योंकि वह सिर्फ अपनी ड्यूटी नहीं निभाते, बल्कि दिल से दूसरों का काम आसान करने की कोशिश करते हैं। दफ़्तर के कई कर्मचारियों की ज़ुबान पर एक ही बात रहती है, "अच्छा है कि प्रसेनजीत बाबू हैं, वरना इतनी मुश्किलें सुलझाना वाकई बहुत कठिन हो जाता।" उनकी यही ईमानदारी और मदद करने की भावना उन्हें सबसे अलग बनाती है।
