Iran-US Nuclear Deal: ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते की घोषणा कभी भी हो सकती है। कतर की मध्यस्थता, पाकिस्तान की सक्रियता और ट्रंप के बयान के बाद मिडिल ईस्ट में हलचल तेज हो गई है। जानिए समझौते की बड़ी शर्तें और अंदर की पूरी कहानी।
मिडिल ईस्ट की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। तेहरान से लेकर वाशिंगटन तक कूटनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं और संकेत मिल रहे हैं कि ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से अटका परमाणु समझौता अब किसी निष्कर्ष की ओर बढ़ सकता है। दोनों देशों के बीच जो नया ड्राफ्ट प्रस्ताव तैयार हुआ है, उसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है।

सूत्रों के मुताबिक ईरान को अमेरिका की तरफ से भेजा गया ड्राफ्ट प्रस्ताव मिल चुका है और तेहरान में उसकी समीक्षा की जा रही है। खास बात यह है कि इस पूरे मसौदे को तैयार कराने में कतर ने अहम भूमिका निभाई है। यही वजह है कि खाड़ी क्षेत्र में कतर की कूटनीतिक सक्रियता अचानक बढ़ी हुई नजर आ रही है।
तेहरान में बढ़ी राजनीतिक हलचल
रिपोर्ट्स के अनुसार पाकिस्तान के गृह मंत्री मोहसिन नकवी बुधवार को तेहरान पहुंचे और वहां ईरान के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की। इस मुलाकात को सिर्फ सामान्य राजनयिक दौरा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे संभावित परमाणु समझौते से जोड़कर देखा जा रहा है। इसी बीच ईरानी मीडिया में यह खबर भी सामने आई कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के भी तेहरान जाने की संभावना है। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय स्तर पर पाकिस्तान भी इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है।
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क्या है अमेरिका का नया ड्राफ्ट प्रस्ताव?
अरबी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह प्रस्ताव किसी विस्तृत संधि की बजाय एक “ज्ञापन” यानी मेमोरेंडम के रूप में तैयार किया गया है। माना जा रहा है कि यह शुरुआती सहमति बनाने के लिए एक छोटा प्रारूप है, ताकि दोनों पक्ष पहले बुनियादी मुद्दों पर सहमत हो सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुरुआती स्तर पर समझौता हो जाता है, तो हज के बाद दोनों देशों के बीच आमने-सामने की विस्तृत बातचीत आयोजित की जा सकती है। हज इस महीने के अंत तक समाप्त होने वाला है, इसलिए आने वाले कुछ सप्ताह बेहद अहम माने जा रहे हैं।
ट्रंप ने क्या कहा?
अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने बुधवार को पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि समझौते की घोषणा किस तरीके से होगी, इस पर अभी अंतिम चर्चा नहीं हुई है। हालांकि उन्होंने सीधे तौर पर इन खबरों का खंडन भी नहीं किया। ट्रंप के इस बयान को कूटनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। जानकार मानते हैं कि अमेरिका फिलहाल सार्वजनिक रूप से ज्यादा खुलासा करने से बच रहा है, ताकि बातचीत प्रभावित न हो।
कतर क्यों बना सबसे अहम खिलाड़ी?
अमेरिकी मीडिया आउटलेट एक्सियोस की रिपोर्ट के अनुसार इस मसौदे को तैयार कराने में कतर की केंद्रीय भूमिका रही है। कतर लंबे समय से खुद को मिडिल ईस्ट में मध्यस्थ के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता रहा है और इस बार भी वही रणनीति दिखाई दे रही है। बताया जा रहा है कि कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी खुद इस प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं। कतर की कोशिश है कि ईरान और अमेरिका दोनों की न्यूनतम शर्तों को ध्यान में रखकर ऐसा रास्ता निकाला जाए जिससे क्षेत्रीय तनाव कम हो सके।
आखिर कहां फंसा है पूरा मामला?
परमाणु समझौते को लेकर अमेरिका और ईरान के बीच कई बड़े मतभेद अब भी बने हुए हैं। अमेरिका की तीन प्रमुख मांगें सामने बताई जा रही हैं-
अमेरिका की मुख्य शर्तें
- ईरान सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करे कि वह कभी परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।
- ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम को अमेरिका या अंतरराष्ट्रीय निगरानी में स्थानांतरित करे।
- ईरान खाड़ी क्षेत्र में सक्रिय अपने प्रॉक्सी नेटवर्क को सीमित या समाप्त करे।
ईरान की मांगें
- ईरान चाहता है कि उसके मिसाइल कार्यक्रम को बातचीत से बाहर रखा जाए।
- तेहरान की कोशिश है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसके नियंत्रण और टोल व्यवस्था को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिले।
- अमेरिका ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटाए।
- विदेशों में फ्रीज किए गए ईरानी धन को वापस किया जाए।
क्या मिडिल ईस्ट में कम होगा तनाव?
अगर यह समझौता सफल होता है तो इसका असर सिर्फ ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। इससे पूरे मिडिल ईस्ट की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है। तेल बाजार, खाड़ी सुरक्षा, इजराइल-ईरान तनाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि फिलहाल दोनों देश सार्वजनिक रूप से सख्त रुख दिखा रहे हैं, लेकिन पर्दे के पीछे समझौते की जमीन तैयार की जा चुकी है। अब सबकी नजर ईरान के आधिकारिक जवाब और उसके बाद संभावित घोषणा पर टिकी हुई है।
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