ईरान-अमेरिका परमाणु समझौते ने दुनिया को चौंका दिया है। हथियार-ग्रेड एनरिच्ड यूरेनियम छोड़ने की गुप्त सहमति, ट्रंप की शांति डील, होरमुज़ जलडमरूमध्य, इज़राइल हमले और अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन की खबरों ने पश्चिम एशिया में नए भू-राजनीतिक तूफान के संकेत दे दिए हैं।
वाशिंगटन/तेहरान: मध्य-पूर्व (West Asia) में जारी भयंकर तनाव के बीच एक ऐसी सनसनीखेज खबर सामने आई है, जिसने पूरी दुनिया को राहत दी है। परमाणु बम बनाने की कगार पर खड़े ईरान ने अमेरिका के साथ चल रही बेहद गोपनीय शांति वार्ता में अपने सबसे खतरनाक 'एनरिच्ड यूरेनियम' (Enriched Uranium) के भंडार को छोड़ने के लिए सैद्धांतिक रूप से सहमति दे दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और तेहरान के बीच होने जा रहा यह ऐतिहासिक समझौता न सिर्फ क्षेत्र में जारी युद्ध को रोकेगा, बल्कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 'होरमुज़ जलडमरूमध्य' को भी फिर से खुलवाएगा।

पेंटागन का सीक्रेट प्लान: बंकर-बस्टिंग बम और कमांडो ऑपरेशन का खौफ
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' (NYT) की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के अनुसार, इस सहमति के पीछे अमेरिकी सेना का वो खौफनाक प्लान था, जिसने ईरान को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) के सैन्य योजनाकारों ने ईरान के इस्फ़हान परमाणु केंद्र में ज़मीन के नीचे छिपे यूरेनियम भंडारों को मलबे में तब्दील करने के लिए 'बंकर-बस्टिंग बमों' के इस्तेमाल का पूरा खाका तैयार कर लिया था। इतना ही नहीं, राष्ट्रपति ट्रंप ने एक समय पर इस परमाणु भंडार पर सीधे कब्ज़ा करने के लिए अमेरिका और इज़राइल के एक बेहद खतरनाक 'संयुक्त कमांडो ऑपरेशन' को मंज़ूरी देने पर भी विचार किया था। अमेरिका ने साफ चेतावनी दी थी कि अगर यूरेनियम सौंपने पर शुरुआती सहमति नहीं बनी, तो बातचीत तुरंत तोड़कर ईरान पर दोबारा भीषण सैन्य हमले शुरू कर दिए जाएंगे।

हथियार-ग्रेड यूरेनियम पर क्यों मचा है हड़कंप?
अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के चौंकाने वाले आंकड़ों के अनुसार, ईरान के पास इस समय लगभग 400 किलोग्राम ऐसा यूरेनियम मौजूद है, जो 60 प्रतिशत शुद्धता तक एनरिच्ड है। इज़राइली खुफिया एजेंसियों का दावा था कि यह भंडार 'वेपन्स-ग्रेड' के बेहद करीब है और इसे थोड़ा सा और परिष्कृत करके ईरान आसानी से कई परमाणु बम बना सकता था। हालांकि, ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने पहले कड़े निर्देश दिए थे कि यह परमाणु सामग्री देश से बाहर नहीं जानी चाहिए, लेकिन अमेरिकी हमलों और प्रतिबंधों के चौतरफा दबाव के आगे आखिरकार तेहरान को झुकना ही पड़ा।
क्या फिर दोहरायी जाएगी 'ओबामा युग' जैसी डील?
इस संभावित महा-समझौते का ढांचा साल 2015 के उस ऐतिहासिक परमाणु समझौते जैसा ही हो सकता है, जब ईरान ने अपना यूरेनियम रूस को सौंप दिया था। मौजूदा प्रस्ताव के तहत दूसरा विकल्प इस यूरेनियम की शुद्धता को इतना कम (Dilute) करना है कि यह हथियारों के काम न आ सके। इस बड़ी रियायत के बदले अमेरिका विदेशों में फ्रीज़ की गई ईरान की अरबों डॉलर की ज़ब्त संपत्तियों को बहाल करने पर सहमत हुआ है। हालांकि, पुनर्निर्माण सहायता से जुड़े ये फंड तभी जारी होंगे जब अंतिम समझौता पूरी तरह लागू हो जाएगा, ताकि तेहरान अपनी प्रतिबद्धताओं से पीछे न हट सके।
उल्लेखनीय है कि 28 फरवरी को अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर किए गए विनाशकारी हमलों के ठीक 12 हफ्तों बाद यह कूटनीतिक सफलता हाथ लगी है, जिसने पूरे खाड़ी क्षेत्र की भू-राजनीति को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।
क्या फिर दोहराया जाएगा 2015 वाला फार्मूला?
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि नया समझौता 2015 के परमाणु समझौते जैसा हो सकता है, जब ईरान ने अपने बड़े यूरेनियम भंडार को रूस भेज दिया था। इसके बदले आर्थिक प्रतिबंधों में राहत दी गई थी। इस बार भी अरबों डॉलर की जमी हुई ईरानी संपत्तियों को रिलीज़ करने की बात चल रही है। यही आर्थिक राहत तेहरान को बातचीत जारी रखने के लिए प्रेरित कर सकती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है-क्या दोनों देशों के बीच दशकों पुरा अविश्वास वास्तव में खत्म हो पाएगा, या यह शांति सिर्फ एक अस्थायी विराम साबित होगी?


