Israel Election Results: इजरायल चुनाव में नेतन्याहू बहुमत से दूर हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इजरायल में सत्ता बदलने से भारत के साथ संबंधों पर कोई असर पड़ेगा?
India Israel Relations: इजरायल के चुनाव नतीजे आ गए हैं, लेकिन तस्वीर अभी भी साफ नहीं है। जनता ने न तो प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) को पूर्ण बहुमत दिया है और न ही उन्हें पूरी तरह से नकारा है। हमास हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान और ईरान के साथ हुए युद्धों के बीच इजरायल को संभालने वाले नेतन्याहू का भविष्य अब अधर में है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इस राजनीतिक अनिश्चितता का मतलब है कि आने वाले कई हफ्तों तक इजरायल में जोड़-तोड़ की राजनीति देखने को मिल सकती है। लेकिन, इन सबके बीच भारतीयों के मन में एक बड़ा सवाल है कि इजरायल में अगर कोई नया प्रधानमंत्री आता है, तो भारत और इजरायल की दोस्ती का क्या होगा? आइए जानते हैं कि इजरायल में फिलहाल क्या हो रहा है और इसका भारत पर क्या असर पड़ सकता है...
इजरायल चुनाव में किसे कितनी सीटें?
इजरायल की संसद (नेसेट) में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा 61 है। अभी के हालात पर नजर डालें, तो नेतन्याहू के गठबंधन (दक्षिणपंथी) को 53 सीटों पर जीत मिली हैं। जबकि गादी ईसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्ष दल को 48 सीटें मिली हैं। वहीं, 19 सीटों पर अरब पार्टियां का कब्जा है।
इजराइल में किंगमेकर बनीं अरब पार्टियां
इन आंकड़ों से साफ है कि न तो नेतन्याहू और न ही ईसेनकोट अरब पार्टियों के समर्थन के बिना सरकार बना सकते हैं। दिलचस्प बात ये है कि दोनों ही नेता पहले अरब पार्टियों (द जॉइंट लिस्ट और राम) के साथ गठबंधन से इनकार कर चुके हैं। हालांकि, ईसेनकोट के रुख में थोड़ी नरमी आई है और उन्होंने कुछ शर्तों के साथ उनके साथ जुड़ने का इशारा किया है। अब इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग सबसे बड़ी पार्टी के नेता, यानी नेतन्याहू को सरकार बनाने का न्यौता देंगे। नियम के मुताबिक, नेतन्याहू के पास बहुमत साबित करने के लिए 42 दिन का समय होगा। अगर वो फेल हुए, तो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के नेता को 28 दिन मिलेंगे। अगर वे भी नाकाम रहे, तो किसी तीसरे उम्मीदवार को 14 दिन दिए जाएंगे। अगर इसके बाद भी सरकार नहीं बनती, तो इजरायल में दोबारा चुनाव होंगे।
इजरायल में सरकार बनाने के 3 रास्ते
ईसेनकोट और अरब पार्टियों का गठबंधन
ये सबसे सीधा रास्ता है, जो विपक्ष को 67 सीटों के साथ बहुमत दिला सकता है। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। ईसेनकोट (पूर्व IDF प्रमुख) हमास और ईरान पर सख्त रुख रखते हैं और फिलिस्तीन को अलग देश बनाने के खिलाफ हैं, जबकि अरब पार्टियां हमास को खत्म करने के लक्ष्य का समर्थन नहीं करतीं। अगर ऐसा हुआ तो नेतन्याहू के लिए यह किसी बुरे सपने से कम नहीं होगा, क्योंकि उन पर 7 अक्टूबर 2023 के हमास हमले में हुई सुरक्षा चूकों की जांच बैठ सकती है और भ्रष्टाचार के पुराने मामले भी खुल सकते हैं।
एकजुट सरकार
दूसरा रास्ता ये है कि नेतन्याहू और ईसेनकोट मिलकर सरकार (Unity Government) बना लें। इसके लिए नेतन्याहू को अपने कुछ कट्टर दक्षिणपंथी साथियों का साथ छोड़ना पड़ सकता है। लेकिन ईसेनकोट नेतन्याहू के नेतृत्व में काम करने से लगातार इनकार करते रहे हैं, क्योंकि वे 7 अक्टूबर के हमले के लिए नेतन्याहू को जिम्मेदार मानते हैं।
दलबदल का खेल
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर कुछ काम नहीं आया, तो नेतन्याहू अपनी राजनीतिक चालाकी दिखाते हुए ईसेनकोट के खेमे से नफ्ताली बेनेट या एविग्डोर लिबरमैन जैसे पुराने साथियों को तोड़कर अपने पाले में ला सकते हैं।
दोबारा चुनाव की नौबत आई तो क्या होगा?
जानकारों के मुताबिक, अगर इजरायल में कोई भी सरकार नहीं बना पाया, तो अगले साल फिर से चुनाव हो सकते हैं। ये स्थिति नेतन्याहू के लिए ज्यादा बुरी नहीं होगी, क्योंकि तब तक वे केयरटेकर प्रधानमंत्री बने रहेंगे। ऐसी चर्चा है कि अमेरिकी मिडटर्म चुनावों के बाद अमेरिका और इजरायल ईरान पर बड़ा सैन्य हमला कर सकते हैं। अगर ईरान के साथ तनाव बढ़ता है, तो इसका फायदा चुनाव में नेतन्याहू को मिल सकता है।
भारत और इजरायल के रिश्तों पर क्या होगा असर?
अब आते हैं सबसे अहम सवाल पर। पिछले कुछ सालों में भारत और इजरायल के रिश्ते बेहद मजबूत हुए हैं। 2017 में पीएम मोदी के इजरायल दौरे के दौरान दोनों नेताओं की ओल्गा बीच पर नंगे पैर टहलते हुए तस्वीर कौन भूल सकता है? इसी साल फरवरी में पीएम मोदी के इजरायल दौरे के दौरान इन रिश्तों को 'स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप' का दर्जा दिया गया। आज भारत इजरायल के कुल हथियार निर्यात का 40% खरीदता है। भारत मिसाइल, एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन और छोटे हथियारों के लिए इजरायल पर काफी हद तक निर्भर है। आने वाले समय में दोनों देश 'आत्मनिर्भर भारत' के तहत मिलकर हथियार बनाने और तकनीक शेयर करने पर फोकस करेंगे।
क्या भारत-इजराइल की दोस्ती पर कोई असर पड़ेगा?
जानकारों का कहना है, बिल्कुल नहीं! अगर नेतन्याहू प्रधानमंत्री नहीं भी बनते हैं, तो भी भारत और इजरायल के रिश्तों में खटास आने की कोई गुंजाइश नहीं है। नेतन्याहू से पहले नफ्ताली बेनेट और येर लापिड के समय भी भारत-इजरायल के संबंध मजबूत ही रहे। दोनों देश सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि टेक्नोलॉजी, साइबर सिक्योरिटी, AI, स्पेस और एग्रीकल्चर में भी मिलकर काम कर रहे हैं। इजरायल में सत्ता किसी की भी आए, भारत के साथ उनकी दोस्ती अटल रहने की ही उम्मीद है।






