1948 के अरब-इजरायल युद्ध में गैलिली के मुस्लिम बेदौइन अल-हैब कबीले ने यहूदी सेनाओं का साथ दिया था। करीब 70 युवाओं ने पाल्माच के साथ सैन्य प्रशिक्षण लिया और खुफिया जानकारी जुटाने में मदद की। आखिर इसके पीछे क्या वजह थी? जानिए कैसे गैलिली के इन लड़ाकों ने मध्य पूर्व के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

Israel History: इजराइल और अरबों के बीच संघर्ष की चर्चा होती है तो अक्सर दोनों पक्षों को आमने-सामने खड़ा करके देखा जाता है। लेकिन 1948 के पहले अरब-इजरायल युद्ध की एक कहानी इस तस्वीर का दूसरा पहलू दिखाती है। उस समय गैलिली के मुस्लिम बेदौइन कबीले 'अल-हैब' ने यहूदी सेनाओं का साथ देने का फैसला किया था। कबीले के करीब 70 युवाओं को सैन्य प्रशिक्षण दिया गया और उन्होंने यहूदी लड़ाकों के साथ मिलकर काम किया। आखिर एक मुस्लिम अरब कबीले ने यह कदम क्यों उठाया?

Israel 1948 War: कौन था अल-हैब बेदौइन कबीला?

  • अल-हैब कबीला उत्तरी फिलिस्तीन के गैलिली क्षेत्र में तूबा गांव के आसपास रहता था। इसके मुखिया शेख हुसैन इस्माइल अबू यूसुफ थे।
  • कबीले के यहूदी बस्तियों के साथ पहले से दोस्ताना संबंध थे। 1936-39 के अरब विद्रोह के दौरान भी उसने यहूदी समुदायों पर हमलों में हिस्सा लेने से इनकार किया था।
  • शेख अबू यूसुफ ने ज्यूइश नेशनल फंड को जमीन भी बेची थी। बाद में इस जमीन पर किबुत्ज कफार हनासी बसा।
  • कबीले के अरब हायर कमिटी से मतभेद थे। उसे यह भी लगता था कि आने वाले संघर्ष में यहूदी सेनाओं की जीत हो सकती है।

Palmach Alliance: यहूदी कमांडरों ने कैसे परखा भरोसा?

  • 1948 की शुरुआत में शेख अबू यूसुफ ने पाल्माच कमांडर यिगाल एलोन से संपर्क किया। उन्होंने अपने कबीले की यहूदी राष्ट्र के प्रति वफादारी जताई और साथ मिलकर काम करने का प्रस्ताव रखा।
  • यहूदी कमांडरों ने पहले उनकी विश्वसनीयता जांची। उनसे ब्नोट याकोव ब्रिज के पार सीरियाई सेना की तैनाती की जानकारी मांगी गई।
  • शेख ने जो जानकारी दी, वह दूसरे खुफिया स्रोतों से मिली सूचनाओं से मेल खा गई।
  • इसके बाद कबीले के युवाओं को पाल्माच की यिफताह ब्रिगेड के तहत काम करने का मौका मिला।

70 Bedouin Fighters: कैसे बनी पाल-हेइब प्लाटून?

  • इस समझौते के बाद 'पाल-हेइब प्लाटून' बनाई गई। इसकी कमान इसाक हैंकिन को सौंपी गई और महमूद अल-उबैद ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई।
  • करीब 70 बेदौइन युवाओं को हथियार चलाने और सैन्य रणनीति का प्रशिक्षण दिया गया।
  • शुरुआत में उन्हें गांव की सुरक्षा, खाइयां खोदने और मोर्चे तैयार करने की जिम्मेदारी मिली।
  • बाद में उन्होंने ऑपरेशन माटाटे से पहले खुफिया जानकारी जुटाने में मदद की। यह अभियान 3 मई 1948 को शुरू हुआ था।
  • गैलिली के पहाड़ी रास्तों और स्थानीय अरब समुदायों की जानकारी उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।

Israel-Arab Relations: क्या सभी बेदौइन यहूदी सेनाओं के साथ थे?

  • नहीं। कुछ बेदौइन कबीलों ने यहूदी सेनाओं का साथ दिया, कुछ अरब सेनाओं के साथ रहे और कई तटस्थ रहे। अल-हैब अकेला ऐसा कबीला नहीं था जिसने इजराइल के साथ सहयोग किया।
  • 1948 के युद्ध के बाद भी कुछ बेदौइन इजराइली सुरक्षा बलों में शामिल रहे। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के दौरान बेदौइन बस ड्राइवर यूसुफ ज़ियादना ने नोवा म्यूजिक फेस्टिवल से करीब 30 लोगों को बचाया था। चार बेदौइन चचेरे भाइयों ने भी कई लोगों को सुरक्षित निकाला।

Israel Election 2026: फिर चर्चा में क्यों आया यहूदी-अरब रिश्ता?

  • इजराइल के 27 अक्टूबर 2026 के चुनाव के बाद यहूदी-अरब संबंध फिर चर्चा में हैं। अंतिम मतगणना के मुताबिक नेतन्याहू के गुट को 53, गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को 48 और अरब पार्टियों को 19 सीटें मिली हैं। सरकार बनाने के लिए 120 सदस्यीय नेसेट में 61 सीटों की जरूरत है। ऐसे में अरब पार्टियां निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं।
  • अल-हैब कबीले की कहानी याद दिलाती है कि 1948 का संघर्ष केवल यहूदियों और अरबों के बीच दो खेमों की लड़ाई नहीं था। उस दौर में स्थानीय रिश्ते, कबीलाई दुश्मनी, राजनीतिक हित और अपने समुदाय का भविष्य भी लोगों के फैसले तय कर रहे थे। 2026 के चुनावी आंकड़ों की पुष्टि प्रकाशित नतीजों से की गई है।