क्या डीके शिवकुमार की नई सरकार में पोर्टफोलियो बंटवारा फिर से टूटने की कगार पर है? क्या मंत्री कृष्णा गौड़ा का दिल्ली पहुंचकर BDA-BMRDA कंट्रोल की मांग करना अंदरूनी बगावत है? क्या रिज़वान अरशद की कैबिनेट में एंट्री की कोशिश कांग्रेस में नई खींचतान बढ़ा रही है? क्या रेड्डी विवाद खत्म नहीं हुआ, बल्कि कर्नाटक सत्ता संकट का नया अध्याय शुरू हो गया है?

DK Shivakumar Government Issues: कर्नाटक की नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार में चल रहा सत्ता का घमासान थमने का नाम नहीं ले रहा है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार (DK Shivakumar) के पद संभालने के कुछ ही दिनों बाद, कैबिनेट में पोर्टफोलियो (विभाग) बंटवारे को लेकर असंतोष की आग एक बार फिर भड़क उठी है। अभी पिछले हफ्ते ही वरिष्ठ नेता रामलिंगा रेड्डी के इस्तीफे के ड्रामे को बमुश्किल शांत किया गया था, लेकिन अब एक और हाई-प्रोफाइल मंत्री ने सीधे तौर पर बगावत का बिगुल फूंक दिया है। बेंगलुरु विकास मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा ने उन्हें दिए गए "अधूरे" पोर्टफोलियो को संभालने से साफ इनकार कर दिया है और अपनी शिकायतों का पुलिंदा लेकर सीधे देश की राजधानी दिल्ली का रुख किया है। इस नए राजनीतिक घटनाक्रम ने कर्नाटक से लेकर दिल्ली तक कांग्रेस आलाकमान की नींद उड़ा दी है।

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'मुझे नहीं चाहिए आधा-अधूरा विभाग'-कृष्णा बायरे गौड़ा का तीखा वार

इस नए संकट के केंद्र में बेंगलुरु विकास मंत्रालय (Bengaluru Development Portfolio) का पुराना स्वरूप है। सूत्रों के मुताबिक, मंत्री कृष्णा बायरे गौड़ा पार्टी लीडरशिप पर इस बात के लिए भारी दबाव बना रहे हैं कि बेंगलुरु डेवलपमेंट अथॉरिटी (BDA) और बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी (BMRDA) दोनों को उनके विभाग के तहत वापस लाया जाए। दरअसल, इन दो महा-एजेंसियों के बिना बेंगलुरु विकास मंत्रालय महज एक रबर स्टैंप की तरह रह जाता है, क्योंकि शहर और उसके आसपास के इलाकों की प्लानिंग, करोड़ों के फंड और डेवलपमेंट का असली कंट्रोल इन्हीं के पास होता है। गौड़ा का मानना है कि बिना पावर के इस विभाग को संभालने का कोई औचित्य नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने अब तक औपचारिक रूप से अपना पदभार नहीं संभाला है और आलाकमान से आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।

दिल्ली दरबार में समानांतर पैंतरेबाज़ी: क्या मंत्रियों की उम्मीदें बनेंगी गले की फांस?

सस्पेंस सिर्फ कृष्णा बायरे गौड़ा के दिल्ली पहुंचने तक सीमित नहीं है। कर्नाटक कांग्रेस के एक और कद्दावर विधायक रिज़वान अरशद भी अचानक राष्ट्रीय राजधानी पहुंच चुके हैं। सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज है कि रिज़वान अरशद दिल्ली में डेरा डालकर राज्य कैबिनेट में जगह पाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। मंत्रियों और विधायकों की इन समानांतर कोशिशों से यह बात पूरी तरह साफ हो गई है कि सरकार बनने और विभागों के एलान के बावजूद कई दिग्गजों की महत्वाकांक्षाएं अधूरी रह गई हैं। एक तरफ डीके शिवकुमार अपनी सरकार को स्थिर और एकजुट दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विधायकों का दिल्ली की ओर यह सामूहिक पलायन उनके दावों की पोल खोल रहा है।

आधी रात का वो समझौता और रेड्डी विवाद का अधूरा सच

यह पूरी कहानी और ज्यादा पेचीदा तब हो जाती है, जब हम इसके इतिहास को देखते हैं। अभी एक हफ़्ते से भी कम समय पहले वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामलिंगा रेड्डी ने 'मेजर और मीडियम इरिगेशन' (बड़ी और मध्यम सिंचाई) विभाग से यह आरोप लगाते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था कि उनसे किया गया वादा तोड़ा गया है। रेड्डी का दावा था कि कैबिनेट गठन से पहले उन्हें बेंगलुरु विकास विभाग देने का वचन दिया गया था, जो बाद में कृष्णा बायरे गौड़ा को थमा दिया गया। हालांकि, शिवकुमार ने आधी रात को रेड्डी के साथ एक गुप्त और लंबी बैठक की, जिसके बाद रेड्डी ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया। शिवकुमार ने मीडिया के सामने इसे "पारिवारिक मामला" बताते हुए कहा था कि सब कुछ सुलझा लिया गया है। लेकिन किसे पता था कि जिस विभाग को देकर रेड्डी का गुस्सा शांत किया गया था, वही विभाग अब गौड़ा के लिए असंतोष की नई वजह बन जाएगा।

शिवकुमार के सामने 'महा-इम्तिहान': क्या बच पाएगी कर्नाटक सरकार की साख?

डीके शिवकुमार ने जब कर्नाटक की कमान संभाली थी, तो उन्होंने जनता और आलाकमान से एक बेहद मजबूत, एकजुट और स्थिर सरकार देने का वादा किया था। लेकिन सरकार बनने के शुरुआती दिनों में ही जिस तरह से एक के बाद एक बगावत की चिंगारियां उठ रही हैं, उसने मुख्यमंत्री की संकट-प्रबंधन (Crisis Management) की क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मंत्रियों की ज्यादा अधिकारों की भूख और विधायकों की कैबिनेट में शामिल होने की होड़ के बीच संतुलन बनाना अब शिवकुमार के बस से बाहर होता दिख रहा है। ऐसे में यह देखना बेहद दिलचस्प और सस्पेंस से भरा होगा कि दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान कृष्णा बायरे गौड़ा की शर्तों के आगे झुकता है या फिर कर्नाटक की सत्ता में कोई नया बड़ा फेरबदल देखने को मिलेगा।