Lalbaug के Ganpati जुलूस के दौरान छूटे टनों चप्पल‑जूते अब कचरे में नहीं जा रहे। स्वेच्छिक समूह इन्हें इकट्ठा कर छांटते, साफ करते और उपयोग लायक जोड़ों को जरूरतमंदों तक पहुंचाते हैं, जबकि क्षतिग्रस्त फुटवियर का रीसाइक्लिंग होता है।

Mumbai Ganpati Festival: लालबाग के गणपति जुलूस में हर साल भारी भीड़ उमड़ती है। लंबी दूरी, बारिश, उमस और भीड़भाड़ के बीच कई श्रद्धालुओं के जूते-चप्पल रास्ते में छूट जाते हैं। आमतौर पर बिखरा हुआ यह फुटवियर कचरे का हिस्सा बन जाता है, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग रही।

जुलूस के बाद बड़ी मात्रा में जमा हुए फुटवियर को स्थानीय स्तर पर समन्वित प्रयासों के जरिए इकट्ठा किया गया। इसके बाद उपयोगी जोड़ियों की छंटाई, सफाई और मरम्मत कर उन्हें दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाया गया। इस पहल का मकसद सिर्फ कचरा कम करना नहीं, बल्कि जरूरतमंद लोगों तक रोजमर्रा की उपयोगी वस्तुएं पहुंचाना भी रहा।

जुलूस में क्यों छूट जाते हैं जूते-चप्पल?

गणपति जुलूस के दौरान लंबे समय तक पैदल चलना पड़ता है। उमस और बारिश के कारण रास्तों पर फिसलन भी रहती है। ऐसे में कई लोग आराम के लिए चप्पल या जूते उतार देते हैं।

भीड़ में धक्कामुक्की और आगे बढ़ने की तेज रफ्तार के कारण कई बार फुटवियर पीछे छूट जाते हैं। खासतौर पर खुली चप्पल, स्लिपर और हल्के जूते भीड़ में आसानी से निकल जाते हैं। बाद में वापस लौटकर अपनी जोड़ी पहचानना भी मुश्किल हो जाता है।

टनों फुटवियर का हुआ संग्रह

जुलूस खत्म होने के बाद स्वेच्छिक टीमों ने अलग-अलग स्थानों पर पड़े जूते-चप्पलों को इकट्ठा किया और उन्हें निर्धारित केंद्रों तक पहुंचाया। यहां फुटवियर को उनके आकार, प्रकार और स्थिति के आधार पर अलग-अलग किया गया।

इस दौरान बिछड़ी हुई सिंगल चप्पलों और जूतों की जोड़ियां बनाने की कोशिश भी की गई। जो फुटवियर अच्छी स्थिति में थे, उन्हें आगे की प्रक्रिया के लिए रखा गया, जबकि बुरी तरह क्षतिग्रस्त सामान को रीसाइक्लिंग के लिए अलग कर दिया गया।

सफाई और मरम्मत के बाद फिर इस्तेमाल

उपयोग के लायक फुटवियर की छोटी-मोटी मरम्मत की गई। कहीं स्ट्रैप बदली गई तो कहीं सोल और सिलाई को ठीक किया गया। इसके बाद जूते-चप्पलों की अच्छी तरह सफाई और सैनिटाइजेशन किया गया।

तैयार फुटवियर को पैक कर जरूरत के हिसाब से वितरण के लिए सूचीबद्ध किया गया। इन्हें सामुदायिक केंद्रों, आश्रय स्थलों और ऐसे इलाकों तक पहुंचाने पर जोर दिया गया जहां बुनियादी उपयोग की वस्तुओं की जरूरत अधिक है।

वहीं, जो फुटवियर दोबारा इस्तेमाल के लायक नहीं थे, उनसे निकलने वाले रबर और सिंथेटिक हिस्सों को रीसाइक्लिंग चैनलों में भेजने की कोशिश की गई, ताकि बेकार सामग्री को भी उपयोगी संसाधन में बदला जा सके।

अगली बार कचरा कम करने की तैयारी

इस पहल के साथ भविष्य के लिए भी कई आसान उपायों पर विचार किया जा रहा है। जुलूस मार्ग पर स्पष्ट संकेतक, अस्थायी फुटवियर काउंटर और टोकन जैसी व्यवस्था की जा सकती है, जिससे श्रद्धालुओं के जूते-चप्पल खोने की घटनाएं कम हों।

इसके अलावा, जुलूस खत्म होते ही संग्रह केंद्रों को सक्रिय कर फुटवियर की छंटाई और पुनर्वितरण की प्रक्रिया को तेज करने पर जोर दिया जा रहा है।

इस तरह त्योहार की भव्यता और आस्था के साथ पर्यावरण की जिम्मेदारी को भी जोड़ा जा सकता है। जुलूस में छूटे फुटवियर को लैंडफिल में जाने से बचाकर दोबारा उपयोग में लाना ‘दूसरी जिंदगी’ और सस्टेनेबिलिटी की एक अच्छी मिसाल बन सकता है।